यांति देव-व्रता देवान
पितृन यांति पितृ-व्रताः
भूतानि यांति भूतैज्य
यांति मद्-याजिनोऽपि मां
"जो देवताओं की पूजा करते हैं, वे देवताओं के मध्य जन्म लेंगे; जो भूतों और आत्माओं की पूजा करते हैं, वे ऐसे प्राणियों के मध्य जन्म लेंगे; जो पूर्वजों की पूजा करते हैं वे पूर्वजों के पास जाते हैं; और जो मेरी पूजा करते हैं वे मेरे साथ रहेंगे।"
आत्म-भावितः शब्द यह भी इंगित करता है कि एक भक्त हमेशा बंधी हुई आत्माओं को मुक्त करने के लिए उपदेश देने में लगा रहता है। षट गोस्वामियों के बारे में कहा जाता है, नाना-शास्त्र-विचारणैक-निपुणौ सद-धर्म-संस्थापकौ लोकानम हित-कारिणौ। ईश्वर का एक शुद्ध भक्त हमेशा यही सोचता रहता है कि कैसे गिरी हुई, बद्ध आत्माओं को मुक्त किया जा सकता है। ईश्वर का सर्वोच्च व्यक्तित्व, गिरी हुई आत्माओं को मुक्त करने के दयालु भक्तों के प्रयास से प्रभावित होकर, अपनी निरंतर दया से आम लोगों को भीतर से प्रबुद्ध करता है। यदि किसी भक्त को किसी अन्य भक्त द्वारा धन्य किया जाता है, तो वह कर्म-कांड और ज्ञान-कांड गतिविधियों से मुक्त हो जाता है। जैसा कि ब्रह्म-संहिता में पुष्टि की गई है, वेदुषु दुर्लभम: ईश्वर का सर्वोच्च व्यक्तित्व कर्म-कांड और ज्ञान-कांड के माध्यम से महसूस नहीं किया जा सकता है। अदुर्लभम आत्म-भक्तौ: भगवान को केवल एक ईमानदार भक्त द्वारा ही महसूस किया जाता है। यह भौतिक दुनिया, ब्रह्मांडीय अभिव्यक्ति, ईश्वर के सर्वोच्च व्यक्तित्व द्वारा बनाई गई है, और जीवित संस्थाएं यहां अपना आनंद लेने के लिए आई हैं। वैदिक निर्देश उन्हें विभिन्न नियामक सिद्धांतों के अनुसार मार्गदर्शन करते हैं, और बुद्धिमान लोग इन निर्देशों का लाभ उठाते हैं। इस प्रकार वे बिना परेशान हुए भौतिक जीवन का आनंद लेते हैं। यह वास्तव में भ्रम है, और अपने स्वयं के प्रयास से इस भ्रम से बाहर निकलना बहुत मुश्किल है। सामान्य आबादी भौतिक गतिविधियों में संलग्न है, और जब लोग थोड़े उन्नत होते हैं, तो वे वेदों में वर्णित कर्मकांड समारोहों से आकर्षित होने लगते हैं। हालाँकि, जब कोई इन कर्मकांड समारोहों के प्रदर्शन में निराश हो जाता है, तो वह फिर से भौतिक गतिविधियों में आ जाता है। इस तरह वैदिक अनुष्ठानों के अनुयायी और भौतिक गतिविधियों के अनुयायी दोनों ही सशर्त जीवन में उलझे रहते हैं। इन लोगों को भक्ति सेवा बीज गुरु और कृष्ण की सद्भावना से ही प्राप्त होता है। इसकी पुष्टि चैतन्य-चरितामृत में की गई है: गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाया भक्ति-लता-बीजा।
जब कोई भक्ति सेवा में संलग्न होता है, तो वह अब भौतिक गतिविधियों की ओर आकर्षित नहीं रह जाता है। जब मनुष्य विभिन्न पदनामों से आच्छादित होता है, तो वह भक्ति सेवा में संलग्न नहीं हो सकता है। उस व्यक्ति को ऐसी पदनामक गतिविधियों (सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तम) से मुक्त होना पड़ता है और शुद्ध इंद्रियों के माध्यम से परम भगवान की सेवा करने के लिए शुद्ध होना पड़ता है। हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्ति उच्यते: शुद्ध इंद्रियों के माध्यम से भगवान की सेवा भक्ति-योग या भक्ति सेवा कहलाती है। सच्चे भक्त को हमेशा परमात्मा द्वारा मदद की जाती है, जो प्रत्येक जीवित इकाई के हृदय में निवास करता है, जैसा कि भगवान कृष्ण ने भगवद-गीता (10.10) में पुष्टि की है:
तेषां सतत-युक्तनां
भजतां प्रीति-पूर्वकं
ददामी बुद्धि-योगं तं
येन मामुपयांति ते
"उन लोगों के लिए जो लगातार समर्पित हैं और प्रेम से मेरी पूजा करते हैं, मैं उन्हें वह समझ देता हूँ जिससे वे मेरे पास आ सकते हैं।"
यह भौतिक दुनिया के संदूषण से मुक्त होने का चरण है। ऐसे समय में एक भक्त दूसरे भक्त से मित्रता करता है, और भौतिक गतिविधियों में उसकी व्यस्तता पूरी तरह से समाप्त हो जाती है। उस समय, वह भगवान का अनुग्रह प्राप्त करता है और भौतिक सभ्यता में अपनी आस्था खो देता है, जो वर्णाश्रम-धर्म के साथ शुरू होती है। श्री चैतन्य महाप्रभु स्पष्ट रूप से उस व्यक्ति के बारे में बोलते हैं जो वर्णाश्रम-धर्म, मानव सभ्यता की सबसे श्रेष्ठ प्रणाली से मुक्त हो जाते हैं। ऐसे समय में व्यक्ति खुद को भगवान कृष्ण का शाश्वत सेवक महसूस करता है, एक स्थिति श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं ली थी:
नाहम विप्रो न च नर-पतिर नापि वैश्यो न शूद्रो
नाहम वर्णी न च गृह-पतिर नो वन-स्थो यतिर वा
किन्तु प्रद्यन निक्खिल-परमानंद-पूर्नामृताब्धेर
गोपी-भर्तुः पद-कमलयोर दास-दासानुदासः
(पद्यवली 63)
"मैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र नहीं हूँ। मैं ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ या संन्यासी नहीं हूँ। मैं क्या हूँ? मैं भगवान कृष्ण के सेवक के सेवक के शाश्वत सेवक हूँ।" शिष्य उत्तराधिकार के माध्यम से, व्यक्ति इस निष्कर्ष पर पहुँच सकता है, जो कि दिव्य मंच पर पूर्ण उन्नति है।
