जैसा कि भगवद्-गीता (7.20) में कहा गया है:
कामैस्तैस्तैर्हृत-ज्ञान:
प्रपद्यन्तेऽन्य-देवता:
तं तं नियममास्थाय
प्रकृत्या नियता: स्वया
"वे लोग जिनके दिमाग भौतिक इच्छाओं से भ्रष्ट हैं वे देवताओं के पास समर्पण करते हैं और अपनी प्रकृति के अनुसार पूजा के विशिष्ट नियमों और विनियमों का पालन करते हैं।" अधिकांश लोग शक्तियाँ प्राप्त करने के लिए देवताओं की पूजा करने में रुचि रखते हैं। प्रत्येक देवता के पास एक विशेष शक्ति होती है। उदाहरण के लिए, स्वर्ग के राजा, देवता इंद्र के पास पृथ्वी को पर्याप्त वनस्पति देने के लिए दुनिया की सतह पर बारिश बरसाने की शक्ति है। वेदों में इस देवता को वर्णित किया गया है: वज्र-हस्त: पुरंदर:। अपने हाथ में वज्र लिए हुए इंद्र जल की आपूर्ति पर शासन करते हैं। वज्र स्वयं इंद्र द्वारा नियंत्रित किया जाता है। इसी तरह, अन्य देवताओं - अग्नि, वरुण, चंद्र, सूर्य - के पास विशेष शक्तियाँ हैं। इन सभी देवताओं की पूजा वैदिक भजनों में एक प्रतीकात्मक हथियार के माध्यम से की जाती है। इसलिए यहाँ कहा गया है, मंत्र-लिंगैर् व्यवच्छिन्नम्। इस तरह की पूजा से, कर्मी जानवरों, संपत्ति, सुंदर पत्नियों, कई अनुयायियों आदि के रूप में भौतिक संपन्नता का वरदान प्राप्त कर सकते हैं। हालाँकि, इस तरह की भौतिक संपन्नता से व्यक्ति भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को नहीं समझ सकता है।
