श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  4.29.45 
शब्दब्रह्मणि दुष्पारे चरन्त उरुविस्तरे ।
मन्त्रलिङ्गैर्व्यवच्छिन्नं भजन्तो न विदु: परम् ॥ ४५ ॥
 
 
अनुवाद
वैदिक ज्ञान, जो अनंत है, के अध्ययन और वैदिक मंत्रों के लक्षणों के अनुसार विभिन्न देवताओं की पूजा करने के बावजूद, देवताओं की पूजा परम शक्तिशाली भगवान को समझने में कोई मदद नहीं करती है।
 
In spite of the study of infinite Vedic knowledge and worship of various deities with the characteristics of Vedic mantras, deity-worship does not help in understanding the Almighty God.
तात्पर्य

जैसा कि भगवद्-गीता (7.20) में कहा गया है:

कामैस्तैस्तैर्हृत-ज्ञान:

प्रपद्यन्तेऽन्य-देवता:

तं तं नियममास्थाय

प्रकृत्या नियता: स्वया

"वे लोग जिनके दिमाग भौतिक इच्छाओं से भ्रष्ट हैं वे देवताओं के पास समर्पण करते हैं और अपनी प्रकृति के अनुसार पूजा के विशिष्ट नियमों और विनियमों का पालन करते हैं।" अधिकांश लोग शक्तियाँ प्राप्त करने के लिए देवताओं की पूजा करने में रुचि रखते हैं। प्रत्येक देवता के पास एक विशेष शक्ति होती है। उदाहरण के लिए, स्वर्ग के राजा, देवता इंद्र के पास पृथ्वी को पर्याप्त वनस्पति देने के लिए दुनिया की सतह पर बारिश बरसाने की शक्ति है। वेदों में इस देवता को वर्णित किया गया है: वज्र-हस्त: पुरंदर:। अपने हाथ में वज्र लिए हुए इंद्र जल की आपूर्ति पर शासन करते हैं। वज्र स्वयं इंद्र द्वारा नियंत्रित किया जाता है। इसी तरह, अन्य देवताओं - अग्नि, वरुण, चंद्र, सूर्य - के पास विशेष शक्तियाँ हैं। इन सभी देवताओं की पूजा वैदिक भजनों में एक प्रतीकात्मक हथियार के माध्यम से की जाती है। इसलिए यहाँ कहा गया है, मंत्र-लिंगैर् व्यवच्छिन्नम्। इस तरह की पूजा से, कर्मी जानवरों, संपत्ति, सुंदर पत्नियों, कई अनुयायियों आदि के रूप में भौतिक संपन्नता का वरदान प्राप्त कर सकते हैं। हालाँकि, इस तरह की भौतिक संपन्नता से व्यक्ति भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को नहीं समझ सकता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)