चूँकि बद्ध जीव सदैव भूख, प्यास आदि शारीरिक आवश्यकताओं से विचलित रहता है, इसीलिए उसे भगवान श्रीकृष्ण की अमृतवाणी सुनने के लिए बहुत कम समय मिल पाता है।
Since the conditioned soul is always distracted by bodily needs such as hunger and thirst, he gets very little time to develop desire to hear the nectar-like words of the Lord.
तात्पर्य
जब तक कोई भक्तों के साथ संगति नहीं रखता, वह कृष्ण चेतना नहीं बढ़ा सकता। निर्जन-भजन, अकेले ही कृष्ण चेतना बढ़ाना, नौसिखियों के लिए संभव नहीं है, क्योंकि वे शारीरिक आवश्यकताओं - खाने, सोने, संभोग और रक्षा से परेशान होंगे। इस तरह से परेशान होकर कोई कृष्ण चेतना नहीं बढ़ा सकता। इसलिए हम देखते हैं कि सहजिया के नाम से जाने जाने वाले भक्त, जो सब कुछ बहुत आसान बनाते हैं, वे उन्नत भक्तों के साथ संगति नहीं करते। ऐसे व्यक्ति, भक्ति गतिविधियों के नाम पर, सभी प्रकार के पापपूर्ण कृत्यों - अवैध यौन संबंध, नशा, जुआ और मांसाहार के आदी होते हैं। ऐसे कई तथाकथित भक्त हैं जो इन पापपूर्ण गतिविधियों में संलग्न रहते हुए खुद को भक्त बताते हैं। दूसरे शब्दों में, जो पापपूर्ण गतिविधि से प्रभावित है उसे कृष्ण चेतना में व्यक्ति के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। पापपूर्ण जीवन के आदी व्यक्ति कृष्ण चेतना का विकास नहीं कर सकता, जैसा कि इस श्लोक में बताया गया है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥