हे राजन, जिस स्थान में शुद्ध भक्त विधि-विधानों का पालन करते हुए नितान्त सचेष्ट रहते हुए उत्सुकतापूर्वक परमात्मा के गुणों का श्रवण और कीर्तन करते रहते हैं उस स्थान में यदि किसी को अमृत के निरंतर प्रवाह को सुनने का अवसर प्राप्त हो तो वह जीवन की आवश्यकताएँ—भूख तथा प्यास—भूल जाएगा और समस्त प्रकार के भय, शोक तथा मोह से मुक्त हो जाएगा।
O King, if one happens to hear the uninterrupted flow of nectar in a place where pure devotees, following the prescribed rituals and thus being all alert and eagerly listening to and chanting the glories of the Lord, he will forget the necessities of life—hunger and thirst—and will become insensitive to all kinds of fear, sorrow and attachment.
तात्पर्य
कृष्ण भावना की साधना तब संभव है जब महाभक्तगण एक साथ रहें और लगातार भगवान के गुणों को सुनने और उनका गुणगान करने में संलिप्त रहें। वृंदावन जैसे पवित्र स्थान में, ऐसे कई भक्त हैं जो लगातार भगवान की महिमा का गुणगान करने और उसे सुनने में लगे रहते हैं। यदि किसी को ऐसे स्थान पर शुद्ध भक्तों से सुनने का मौका मिलता है, तो शुद्ध भक्तों के मुख से अमृत की नदी के प्रवाह की अनुमति देता है, तो कृष्ण भावना की साधना बहुत आसान हो जाती है। जब कोई लगातार भगवान की महिमा सुनने में लगा रहता है, तो वह निश्चित रूप से शारीरिक अवधारणा से ऊपर उठ जाता है। जब कोई शारीरिक अवधारणा में होता है, तो वह भूख-प्यास, भय, विलाप और भ्रम की पीड़ा महसूस करता है। लेकिन जब कोई भगवान की महिमा सुनने और उसका गुणगान करने में लगा रहता है, तो वह शारीरिक अवधारणा से परे हो जाता है। इस श्लोक में "भगवद-गुणानुकथन-श्रवण-व्याग्र-चेतस", जिसका अर्थ है "ऐसे स्थान को खोजने के लिए हमेशा उत्सुक जहाँ पर भगवान का गुणगान किया जाता हो और सुना जा रहा हो", एक महत्वपूर्ण शब्द है। एक व्यवसायी हमेशा उस स्थान पर जाने का इच्छुक रहता है जहां व्यापार होता है। इसी तरह, एक भक्त मुक्त भक्तों के होठों से सुनने के लिए बहुत उत्सुक रहता है। जैसे ही कोई मुक्त भक्तों से भगवान की महिमा सुनता है, वह तुरंत कृष्ण भावना से युक्त हो जाता है। इसकी पुष्टि एक अन्य श्लोक में भी की गई है: सताṁ प्रसंगान् मम वीर्य-संवदो भवन्ति हृत्-कर्ण-रसयाना कथा: तज-जोषणाट आश्व अपवर्ग-वर्तमिनी श्रद्धा रतति भक्ति अनुक्रमिष्यति "शुद्ध भक्तों के संग में, भगवान के व्यक्तित्व और विहारों पर चर्चा कान और ह्रदय के लिए बहुत सुखद होती है। ऐसे ज्ञान का संवर्धन करके व्यक्ति धीरे-धीरे मुक्ति के मार्ग पर आगे बढ़ता है, और उसके बाद वह मुक्त हो जाता है, और उसका आकर्षण स्थिर हो जाता है। फिर वास्तविक भक्ति और भक्ति सेवा शुरू होती है।" (भागवत 3.25.25) शुद्ध भक्तों के संग में, व्यक्ति भगवान की महिमा सुनने और उसका गुणगान करने में आसक्त हो जाता है। इस तरह से व्यक्ति कृष्ण भावना का संवर्धन कर सकता है, और जैसे ही यह संवर्धन आगे बढ़ता है, व्यक्ति भगवान के प्रति निष्ठावान, भगवान के प्रति समर्पित और भगवान के प्रति लगाव वाला बन सकता है, और इस प्रकार व्यक्ति बहुत जल्दी पूर्ण कृष्ण भावना प्राप्त कर सकता है। कृष्ण भावना की साधना में सफलता का रहस्य सही व्यक्ति से सुनना है। एक कृष्णभावनाशील व्यक्ति कभी भी शारीरिक आवश्यकताओं, जैसे खाने, सोने, साथ और रक्षा करने से परेशान नहीं होता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥