अनर्थोपशमं साक्षात
भक्ति-योगं अधोक्षजे
लोकस्याजानतो विद्वांश्
चक्रे सात्वत-संहिताम्
"जीवित इकाई के भौतिक दुख, जो उसके लिए अतिरिक्त हैं, उन्हें भक्ति सेवा की संपर्क प्रक्रिया से सीधे तौर पर कम किया जा सकता है। लेकिन लोगों का समूह यह नहीं जानता, और इसलिए विद्वान व्यासदेव ने इस वैदिक साहित्य का संकलन किया, जो सर्वोच्च सत्य के संबंध में है।" अनर्थ, अवांछित चीजें, एक शारीरिक जीवन से दूसरे शारीरिक जीवन में आती हैं। इस उलझाव से बाहर निकलने के लिए, सर्वोच्च ईश्वर, भगवान वासुदेव, कृष्ण की भक्ति सेवा को अपनाना पड़ता है। इस संबंध में गुरु शब्द महत्वपूर्ण है। गुरु शब्द का अनुवाद "भारी" या "सर्वोच्च" के रूप में किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, गुरु आध्यात्मिक गुरु है। श्रील ऋषभदेव ने अपने पुत्रों को सलाह दी, गुरु न स स्यात... न मोचयेद यः समुपेतमृत्युम: "किसी को भी तब तक आध्यात्मिक गुरु का पद नहीं लेना चाहिए जब तक कि वह अपने शिष्य को जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त करने में सक्षम न हो।" (भाग। 5.5.18) भौतिक अस्तित्व वास्तव में विभिन्न प्रकार की फलदायी गतिविधियों द्वारा लाई गई कार्रवाई और प्रतिक्रिया की एक श्रृंखला है। यही जन्म और मृत्यु का कारण है। वासुदेव की सेवा में खुद को शामिल करके ही इस प्रक्रिया को रोका जा सकता है। भक्ति उन गतिविधियों को संदर्भित करती है जो भगवान वासुदेव की सेवा में की जाती हैं। चूँकि भगवान वासुदेव सर्वोच्च हैं, इसलिए व्यक्ति को उनकी सेवा में, देवताओं की सेवा में नहीं, खुद को शामिल करना चाहिए। भक्ति सेवा नौसिखिया अवस्था से शुरू होती है - नियमों और विनियमों का पालन करने की अवस्था - और भगवान की सहज प्रेममय सेवा तक फैली हुई है। सभी अवस्थाओं का उद्देश्य भगवान वासुदेव को संतुष्ट करना है। जब कोई वासुदेव की भक्ति सेवा में परिपूर्ण रूप से उन्नत हो जाता है, तो वह शरीर की सेवा से पूरी तरह से अलग हो जाता है, अर्थात मटेरियल एक्जिस्टेंस में उसकी निर्धारित स्थिति से। इतना अलग होने के बाद, वह वास्तव में ज्ञान में परिपूर्ण हो जाता है और भगवान वासुदेव की सेवा में पूरी तरह से संलग्न हो जाता है। श्री चैतन्य महाप्रभु कहते हैं, जीवर 'स्वरूप' हया - कृष्णेर 'नित्य-दास': "प्रत्येक जीवित इकाई संवैधानिक स्थिति से कृष्ण की शाश्वत सेवक है।" जैसे ही कोई भगवान वासुदेव की सेवा में संलग्न होता है, वह अपनी सामान्य संवैधानिक स्थिति प्राप्त कर लेता है। इस स्थिति को मुक्त अवस्था कहा जाता है। मुक्ति हित्वन्यथा-रूपं स्वरूपेण व्यवस्थिति: मुक्त अवस्था में, व्यक्ति अपनी मूल कृष्ण भावनापूर्ण स्थिति में स्थित होता है। वह पदार्थ की सेवा में सभी कार्यो को छोड़ देता है, "मैं" और "मेरा" के भ्रम के तहत संचालित सामाजिक सेवा, राष्ट्रीय सेवा, समुदाय सेवा, कुत्ते की सेवा, ऑटोमोबाइल सेवा और इसी तरह की कई अन्य सेवाओं के नाम पर कल्पित संलग्नता को छोड़ देता है। जैसा कि प्रथम खंड के दूसरे अध्याय में समझाया गया है:
वासुदेवे भगवति
भक्ति-योगः प्रयोजितः
जनयत्य आशु वैराग्यं
ज्ञानं च यद अहैतु कम्
भगवान श्री कृष्ण के प्रति भक्ति सेवा के माध्यम से, व्यक्ति तुरंत ही निःस्वार्थ ज्ञान प्राप्त कर लेता है और दुनिया से उसका मोह छूट जाता है। ( भाग. 1.2.7) इसलिए व्यक्ति को भौतिक इच्छाओं, मानसिक अटकलों या सफलता की गतिविधियों से रहित होकर वासुदेव की सेवा करनी चाहिए।
