श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 36-37
 
 
श्लोक  4.29.36-37 
अथात्मनोऽर्थभूतस्य यतोऽनर्थपरम्परा ।
संसृतिस्तद्वय‍वच्छेदो भक्त्या परमया गुरौ ॥ ३६ ॥
वासुदेवे भगवति भक्तियोग: समाहित: ।
सध्रीचीनेन वैराग्यं ज्ञानं च जनयिष्यति ॥ ३७ ॥
 
 
अनुवाद
जीव का असली हित ये है कि वो अज्ञानता से मुक्त हो जाए जिसके चलते उसे जन्म और मृत्यु के चक्र में बार-बार घूमना पड़ता है। इसका इकलौता उपाय है कि भगवान के प्रतिनिधि के माध्यम से उन्हीं की शरण में जाना है। जब तक कोई इंसान भगवान वासुदेव की भक्ति नहीं करता है, तब तक वो इस भौतिक दुनिया से कभी मुक्त नहीं हो सकता है और न ही अपने असली ज्ञान को पा सकता है।
 
The real benefit of a living being is to get out of ignorance due to which he has to endure repeated births and deaths. The only remedy for this is to surrender to the Lord through His representative. Unless a man worships Lord Vasudeva, he can neither become completely detached from this material world nor manifest his true knowledge.
तात्पर्य
ये कृत्रिम भौतिक अवस्था से मुक्त होने का तरीका है। एकमात्र उपाय कृष्ण चेतना को अपनाना और सर्वोच्च ईश्वर, भगवान वासुदेव की भक्ति सेवा में लगातार संलग्न रहना है। हर कोई खुश रहने की कोशिश कर रहा है, और उस खुशी को प्राप्त करने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया को स्वार्थ कहा जाता है। दुर्भाग्य से, इस भौतिक दुनिया के भीतर घूमती हुई संकल्पित आत्मा को यह पता नहीं होता कि स्वार्थ का उसका अंतिम लक्ष्य वासुदेव है। संस्कृति या भौतिक अस्तित्व, जीवन की भ्रमित शारीरिक अवधारणा से शुरू होता है, और इस अवधारणा के आधार पर अवांछित चीजों (अनर्थों) की एक सीरीज आगे बढ़ती है। ये अवांछित चीजें वास्तव में विभिन्न प्रकार की इंद्रिय तृप्ति के लिए मानसिक इच्छाएं हैं। इस तरह से व्यक्ति इस भौतिक दुनिया के भीतर विभिन्न प्रकार के शरीरों को स्वीकार करता है। सबसे पहले मन को नियंत्रित करना होता है ताकि मन की इच्छाओं को शुद्ध किया जा सके। इस प्रक्रिया को नारद-पंचरात्र में सर्वोपाधि-विर्मुक्तं तत्परेण निर मलम के तौर पर वर्णित किया गया है। जब तक कोई अपने मन को शुद्ध नहीं करता तब तक भौतिक अवस्था से मुक्त होने का कोई सवाल ही नहीं उठता। जैसा कि श्रीमद् भागवतम् (1.7.6) में कहा गया है:

अनर्थोपशमं साक्षात

भक्ति-योगं अधोक्षजे

लोकस्याजानतो विद्वांश्

चक्रे सात्वत-संहिताम्

"जीवित इकाई के भौतिक दुख, जो उसके लिए अतिरिक्त हैं, उन्हें भक्ति सेवा की संपर्क प्रक्रिया से सीधे तौर पर कम किया जा सकता है। लेकिन लोगों का समूह यह नहीं जानता, और इसलिए विद्वान व्यासदेव ने इस वैदिक साहित्य का संकलन किया, जो सर्वोच्च सत्य के संबंध में है।" अनर्थ, अवांछित चीजें, एक शारीरिक जीवन से दूसरे शारीरिक जीवन में आती हैं। इस उलझाव से बाहर निकलने के लिए, सर्वोच्च ईश्वर, भगवान वासुदेव, कृष्ण की भक्ति सेवा को अपनाना पड़ता है। इस संबंध में गुरु शब्द महत्वपूर्ण है। गुरु शब्द का अनुवाद "भारी" या "सर्वोच्च" के रूप में किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, गुरु आध्यात्मिक गुरु है। श्रील ऋषभदेव ने अपने पुत्रों को सलाह दी, गुरु न स स्यात... न मोचयेद यः समुपेतमृत्युम: "किसी को भी तब तक आध्यात्मिक गुरु का पद नहीं लेना चाहिए जब तक कि वह अपने शिष्य को जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्त करने में सक्षम न हो।" (भाग। 5.5.18) भौतिक अस्तित्व वास्तव में विभिन्न प्रकार की फलदायी गतिविधियों द्वारा लाई गई कार्रवाई और प्रतिक्रिया की एक श्रृंखला है। यही जन्म और मृत्यु का कारण है। वासुदेव की सेवा में खुद को शामिल करके ही इस प्रक्रिया को रोका जा सकता है। भक्ति उन गतिविधियों को संदर्भित करती है जो भगवान वासुदेव की सेवा में की जाती हैं। चूँकि भगवान वासुदेव सर्वोच्च हैं, इसलिए व्यक्ति को उनकी सेवा में, देवताओं की सेवा में नहीं, खुद को शामिल करना चाहिए। भक्ति सेवा नौसिखिया अवस्था से शुरू होती है - नियमों और विनियमों का पालन करने की अवस्था - और भगवान की सहज प्रेममय सेवा तक फैली हुई है। सभी अवस्थाओं का उद्देश्य भगवान वासुदेव को संतुष्ट करना है। जब कोई वासुदेव की भक्ति सेवा में परिपूर्ण रूप से उन्नत हो जाता है, तो वह शरीर की सेवा से पूरी तरह से अलग हो जाता है, अर्थात मटेरियल एक्जिस्टेंस में उसकी निर्धारित स्थिति से। इतना अलग होने के बाद, वह वास्तव में ज्ञान में परिपूर्ण हो जाता है और भगवान वासुदेव की सेवा में पूरी तरह से संलग्न हो जाता है। श्री चैतन्य महाप्रभु कहते हैं, जीवर 'स्वरूप' हया - कृष्णेर 'नित्य-दास': "प्रत्येक जीवित इकाई संवैधानिक स्थिति से कृष्ण की शाश्वत सेवक है।" जैसे ही कोई भगवान वासुदेव की सेवा में संलग्न होता है, वह अपनी सामान्य संवैधानिक स्थिति प्राप्त कर लेता है। इस स्थिति को मुक्त अवस्था कहा जाता है। मुक्ति हित्वन्यथा-रूपं स्वरूपेण व्यवस्थिति: मुक्त अवस्था में, व्यक्ति अपनी मूल कृष्ण भावनापूर्ण स्थिति में स्थित होता है। वह पदार्थ की सेवा में सभी कार्यो को छोड़ देता है, "मैं" और "मेरा" के भ्रम के तहत संचालित सामाजिक सेवा, राष्ट्रीय सेवा, समुदाय सेवा, कुत्ते की सेवा, ऑटोमोबाइल सेवा और इसी तरह की कई अन्य सेवाओं के नाम पर कल्पित संलग्नता को छोड़ देता है। जैसा कि प्रथम खंड के दूसरे अध्याय में समझाया गया है:

वासुदेवे भगवति

भक्ति-योगः प्रयोजितः

जनयत्य आशु वैराग्यं

ज्ञानं च यद अहैतु कम्

भगवान श्री कृष्ण के प्रति भक्ति सेवा के माध्यम से, व्यक्ति तुरंत ही निःस्वार्थ ज्ञान प्राप्त कर लेता है और दुनिया से उसका मोह छूट जाता है। ( भाग. 1.2.7) इसलिए व्यक्ति को भौतिक इच्छाओं, मानसिक अटकलों या सफलता की गतिविधियों से रहित होकर वासुदेव की सेवा करनी चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)