मात्रा-स्पर्शास तु कौंतेय
शीतोष्ण-सुख-दुःख-दा:
आगमापायिनोऽनित्यास
तांस्तितिक्षस्व भारत
"हे कुन्ती के पुत्र, सुख और दुख की अस्थायी उपस्थिति, और उनकी यथासमय समाप्ति, सर्दियों और गर्मियों के मौसम की उपस्थिति और समाप्ति की तरह होते हैं। वे इंद्रिय बोध से उत्पन्न होते हैं, हे भारतवंशी, और व्यक्ति को बिना परेशान हुए उन्हें सहना सीखना चाहिए।" इस प्रकार, भगवान कृष्ण ने अर्जुन को सूचित किया कि शरीर द्वारा लाया गया सारा दुख आता है और चला जाता है। व्यक्ति को उन्हें सहना सीखना होगा। भौतिक अस्तित्व हमारे सभी कष्टों का कारण है, क्योंकि एक बार जब हम भौतिक स्थिति से बाहर हो जाते हैं तो हम कष्ट नहीं उठाते हैं। इसलिए वेदों में आदेश दिया गया है कि व्यक्ति को तथ्यात्मक रूप से समझना चाहिए कि वह भौतिक नहीं है, बल्कि वास्तव में ब्रह्म है (अहं ब्रह्मास्मि)। यह समझ पूरी तरह से तब तक सिद्ध नहीं की जा सकती जब तक कोई ब्रह्म गतिविधियों में संलग्न नहीं हो, अर्थात् भक्ति सेवा में। भौतिक परिस्थितियों से मुक्त होने के लिए, व्यक्ति को कृष्ण चेतना को अपनाना होगा। यही एकमात्र उपाय है।
