श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  4.29.35 
अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संसृतिर्न निवर्तते ।
मनसा लिङ्गरूपेण स्वप्ने विचरतो यथा ॥ ३५ ॥
 
 
अनुवाद
कभी-कभी हम इसलिए दुख झेलते हैं क्योंकि हमें सपने में शेर या सांप दिखाई देता है, लेकिन वास्तव में वहाँ न तो शेर होता है और न ही सांप। इस तरह हम अपनी सूक्ष्म अवस्था में एक परिस्थिति पैदा कर लेते हैं और उसके परिणामों को भुगतते हैं। इन दुखों से तब तक मुक्ति नहीं मिल सकती जब तक कि हम अपने सपने से जाग नहीं जाते।
 
Sometimes we suffer because we see a lion or a snake in our dreams, but in reality there is neither a lion nor a snake. In this way we create a situation in our subtle state and suffer its consequences. These troubles cannot be resolved until we wake up from our dream.
तात्पर्य
वेदों में कथित है, सजीव शरीर हमेशा दो प्रकार के भौतिक शरीरों से पृथक रहता है- सूक्ष्म और स्थूल। हमारे सभी कष्ट इन भौतिक शरीरों के कारण होते हैं। यह भगवद्-गीता (2.14) में बताया गया है:

मात्रा-स्पर्शास तु कौंतेय

शीतोष्ण-सुख-दुःख-दा:

आगमापायिनोऽनित्यास

तांस्तितिक्षस्व भारत

"हे कुन्ती के पुत्र, सुख और दुख की अस्थायी उपस्थिति, और उनकी यथासमय समाप्ति, सर्दियों और गर्मियों के मौसम की उपस्थिति और समाप्ति की तरह होते हैं। वे इंद्रिय बोध से उत्पन्न होते हैं, हे भारतवंशी, और व्यक्ति को बिना परेशान हुए उन्हें सहना सीखना चाहिए।" इस प्रकार, भगवान कृष्ण ने अर्जुन को सूचित किया कि शरीर द्वारा लाया गया सारा दुख आता है और चला जाता है। व्यक्ति को उन्हें सहना सीखना होगा। भौतिक अस्तित्व हमारे सभी कष्टों का कारण है, क्योंकि एक बार जब हम भौतिक स्थिति से बाहर हो जाते हैं तो हम कष्ट नहीं उठाते हैं। इसलिए वेदों में आदेश दिया गया है कि व्यक्ति को तथ्यात्मक रूप से समझना चाहिए कि वह भौतिक नहीं है, बल्कि वास्तव में ब्रह्म है (अहं ब्रह्मास्मि)। यह समझ पूरी तरह से तब तक सिद्ध नहीं की जा सकती जब तक कोई ब्रह्म गतिविधियों में संलग्न नहीं हो, अर्थात् भक्ति सेवा में। भौतिक परिस्थितियों से मुक्त होने के लिए, व्यक्ति को कृष्ण चेतना को अपनाना होगा। यही एकमात्र उपाय है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)