श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 34
 
 
श्लोक  4.29.34 
नैकान्तत: प्रतीकार: कर्मणां कर्म केवलम् ।
द्वयं ह्यविद्योपसृतं स्वप्ने स्वप्न इवानघ ॥ ३४ ॥
 
 
अनुवाद
नारद कहते रहे: हे निष्पाप कर्म करने वालों! कोई भी व्यक्ति, कृष्णभक्ति रहित अन्य कर्म करके, कर्मों के फल का निराकरण नहीं कर सकता। ये सभी कर्म हमारे अज्ञान के कारण हैं। जब हम एक परेशान करने वाला सपना देखते हैं, तो हम किसी परेशान करने वाले भ्रम के द्वारा उससे छुटकारा नहीं पा सकते। सपने का निवारण तो जागकर ही किया जा सकता है। इसी प्रकार, हमारा भौतिक अस्तित्व हमारे अज्ञान और भ्रम के कारण है। जब तक हम कृष्णभक्ति के प्रति जागृत नहीं हो जाते, हम ऐसे सपनों से छुटकारा नहीं पा सकते। सभी समस्याओं के अंतिम समाधान के लिए, हमें कृष्णभक्ति को जागृत करना होगा।
 
Narada continued: O pure-hearted person, one cannot eliminate the results of one's actions by doing other activities without devotion to Krishna. All such actions are due to our ignorance. When we see a troublesome dream, we cannot get rid of it by any troublesome delusion. The dream can be relieved only by waking up. Similarly, our material existence is due to our ignorance and delusion. Unless devotion to Krishna awakens in us, we cannot get rid of such dreams. To solve all problems, we must awaken Krishna consciousness.
तात्पर्य
फल कार्य दो तरह के होते हैं: हम बोझ को या तो सिर पर रख सकते हैं या कंधे पर। वस्तुत: बोझ को किसी भी जगह रखने से कोई फर्क नहीं पड़ता है। हालाँकि, हस्तांतरण प्रतिरोध के नाम पर हो रहा है। इस संदर्भ में प्रह्लाद महाराज ने कहा कि भौतिक दुनिया के मूर्ख और बदमाश बिना यह जाने कि इस तरह की व्यवस्था, भले ही वे सफल हों, केवल माया है, शारीरिक सुख के लिए इतनी शानदार योजना बनाते हैं। लोग दिन-रात शरीर के भ्रमपूर्ण सुख के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। यह खुशी हासिल करने का तरीका नहीं है। व्यक्ति को इस भौतिक उलझाव से बाहर निकलना होगा और घर लौटना होगा, भगवान के पास वापस जाना होगा। यही असली खुशी है। इसलिए वेद कहते हैं: "इस भौतिक दुनिया के अंधेरे में मत रहो। आध्यात्मिक दुनिया के प्रकाश में जाओ।" इस भौतिक शरीर के संकट का मुकाबला करने के लिए, व्यक्ति को एक और संकटपूर्ण स्थिति लेनी पड़ती है। दोनों ही स्थितियाँ भ्रम है। एक परेशानी का मुकाबला करने के लिए दूसरी परेशानी उठाने से कोई फायदा नहीं है। निष्कर्ष यह है कि जब तक व्यक्ति इस भौतिक संसार में रहता है, तब तक वह स्थायी रूप से खुश नहीं रह सकता। एक ही उपाय है कि इस भौतिक संसार से पूरी तरह से बाहर निकलें और घर लौटें, भगवान के पास वापस जाएँ।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)