श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  4.29.32 
दु:खेष्वेकतरेणापि दैवभूतात्महेतुषु ।
जीवस्य न व्यवच्छेद: स्याच्चेत्तत्तत्प्रतिक्रिया ॥ ३२ ॥
 
 
अनुवाद
सारे जीव भाग्य, अन्य जीवों या फिर शरीर व मन सम्बन्धी दुखों से बचने का प्रयास करते हैं। परन्तु इन नियमों के विरुद्ध हर प्रयास के बावजूद, उन्हें प्रकृति के कानूनों से बंधा रहना पड़ता है।
 
All beings try to escape from the sufferings of fate, other beings, or the mind and body. Yet despite their efforts to resist these laws, they are bound by the laws of nature.
तात्पर्य
जैसे कोई कुत्ता रोटी के टुकड़े या सज़ा के लिए इधर-उधर भटकता है, वैसे ही जीवित प्राणी लगातार खुश रहने और भौतिक दुखों का प्रतिकार करने के लिए कई तरह से योजना बनाते हुए भटकता रहता है। इसे जीवन के लिए संघर्ष कहा जाता है। हम वास्तव में अपने दैनिक जीवन में देख सकते हैं कि कैसे हमें दुखद परिस्थितियों को दूर भगाने की योजनाएँ बनाने के लिए मजबूर किया जाता है। एक दुखद स्थिति से छुटकारा पाने के लिए, हमें खुद को दूसरी तरह की दुखद स्थिति में डालना पड़ता है। एक गरीब आदमी पैसे के अभाव में पीड़ित होता है, लेकिन अगर वह अमीर बनना चाहता है, तो उसे कई तरह से संघर्ष करना पड़ता है। वास्तव में वह एक वैध प्रतिकार प्रक्रिया नहीं है बल्कि भ्रामक ऊर्जा का एक फंदा है। यदि कोई अपनी स्थिति का प्रतिकार करने का प्रयास नहीं करता है, लेकिन अपनी स्थिति से संतुष्ट है, यह जानते हुए कि उसने अपनी स्थिति पिछले कर्मों से प्राप्त की है, तो वह कृष्ण चेतना विकसित करने के लिए अपनी ऊर्जा लगा सकता है। सभी वैदिक साहित्य में इसकी अनुशंसा की गई है:

तस्यैव हेतोः प्रयतेत कोविदो

ना लभ्यते यद् भ्रमताम् उपर्य अधः

तल् लभ्यते दुःखवद अन्यतः सुखं

कालेन सर्वत्र गभीर-रं हसा

"जो व्यक्ति वास्तव में बुद्धिमान और दार्शनिक रूप से प्रेरित हैं, उन्हें केवल उस उद्देश्यपूर्ण अंत के लिए प्रयास करना चाहिए जो सबसे ऊपर के ग्रह [ब्रह्मलोक] से नीचे सबसे नीचे के ग्रह [पाताल] तक भटकने से भी प्राप्त नहीं होता है। जहाँ तक इंद्रिय भोग से प्राप्त सुख का संबंध है, यह समय के साथ अपने आप प्राप्त किया जा सकता है, जैसे समय के साथ हम दुख प्राप्त करते हैं भले ही हम उनकी इच्छा न करें।" (भा. १.५.१८) व्यक्ति को केवल अपनी कृष्ण चेतना विकसित करने का प्रयास करना चाहिए और अपनी भौतिक स्थिति में सुधार करने की कोशिश में अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। वास्तव में भौतिक स्थिति में सुधार नहीं किया जा सकता है। सुधार की प्रक्रिया का अर्थ है एक और दुखद स्थिति को स्वीकार करना। हालाँकि, अगर हम अपनी कृष्ण चेतना को सुधारने का प्रयास करते हैं, तो भौतिक जीवन के कष्ट बाहरी प्रयास के बिना ही गायब हो जाएँगे। इसलिए कृष्ण वादा करते हैं, कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति: "हे कुंती के पुत्र, साहसपूर्वक घोषित करो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता है।" (भगवद गीता 9.31) जो भक्ति सेवा के मार्ग पर चलता है, वह शरीर और मन के सभी कष्टों और अन्य जीवित प्राणियों और भाग्य द्वारा लाई गई सभी दुर्दशाओं के बावजूद कभी नहीं हारेगा, दुख जो हमारे नियंत्रण से परे हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)