तस्यैव हेतोः प्रयतेत कोविदो
ना लभ्यते यद् भ्रमताम् उपर्य अधः
तल् लभ्यते दुःखवद अन्यतः सुखं
कालेन सर्वत्र गभीर-रं हसा
"जो व्यक्ति वास्तव में बुद्धिमान और दार्शनिक रूप से प्रेरित हैं, उन्हें केवल उस उद्देश्यपूर्ण अंत के लिए प्रयास करना चाहिए जो सबसे ऊपर के ग्रह [ब्रह्मलोक] से नीचे सबसे नीचे के ग्रह [पाताल] तक भटकने से भी प्राप्त नहीं होता है। जहाँ तक इंद्रिय भोग से प्राप्त सुख का संबंध है, यह समय के साथ अपने आप प्राप्त किया जा सकता है, जैसे समय के साथ हम दुख प्राप्त करते हैं भले ही हम उनकी इच्छा न करें।" (भा. १.५.१८) व्यक्ति को केवल अपनी कृष्ण चेतना विकसित करने का प्रयास करना चाहिए और अपनी भौतिक स्थिति में सुधार करने की कोशिश में अपना समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। वास्तव में भौतिक स्थिति में सुधार नहीं किया जा सकता है। सुधार की प्रक्रिया का अर्थ है एक और दुखद स्थिति को स्वीकार करना। हालाँकि, अगर हम अपनी कृष्ण चेतना को सुधारने का प्रयास करते हैं, तो भौतिक जीवन के कष्ट बाहरी प्रयास के बिना ही गायब हो जाएँगे। इसलिए कृष्ण वादा करते हैं, कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति: "हे कुंती के पुत्र, साहसपूर्वक घोषित करो कि मेरा भक्त कभी नष्ट नहीं होता है।" (भगवद गीता 9.31) जो भक्ति सेवा के मार्ग पर चलता है, वह शरीर और मन के सभी कष्टों और अन्य जीवित प्राणियों और भाग्य द्वारा लाई गई सभी दुर्दशाओं के बावजूद कभी नहीं हारेगा, दुख जो हमारे नियंत्रण से परे हैं।
