श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 30-31
 
 
श्लोक  4.29.30-31 
क्षुत्परीतो यथा दीन: सारमेयो गृहं गृहम् ।
चरन्विन्दति यद्दिष्टं दण्डमोदनमेव वा ॥ ३० ॥
तथा कामाशयो जीव उच्चावचपथा भ्रमन् ।
उपर्यधो वा मध्ये वा याति दिष्टं प्रियाप्रियम् ॥ ३१ ॥
 
 
अनुवाद
यह जीव बिल्कुल वैसा ही है जैसे एक कुत्ता, जो भूख से व्याकुल होकर भोजन पाने के लिए दरवाजे-दरवाजे जाता है। अपने प्रारब्ध के अनुसार, उसे कभी सज़ा मिलती है और उसे भगा दिया जाता है, या कभी-कभी उसे खाने के लिए थोड़ा भोजन भी मिल जाता है। इसी तरह, जीव भी कई इच्छाओं से वशीभूत होकर अपने भाग्य के अनुसार विभिन्न योनियों में भटकता रहता है। कभी वह ऊँचे स्थान पर पहुँचता है, तो कभी नीच स्थान पर। कभी वह स्वर्ग जाता है, कभी नरक, तो कभी मध्य लोकों में और यही क्रम चलता रहता है।
 
This living being is just like a dog who, tormented by hunger, goes from door to door to get food. According to his destiny, sometimes he is punished and driven away, or sometimes he gets some food to eat. Similarly, the living being, being under the influence of various desires, keeps wandering in different species according to his destiny. Sometimes he attains a high position, sometimes a low position. Sometimes he goes to heaven, sometimes to hell, sometimes to the middle worlds and it goes on like this.
तात्पर्य
जीव की स्थिति यहाँ एक कुत्ते के समान है। संयोग से एक कुत्ते का स्वामी अत्यंत धनी हो सकता है, और संयोग से वह आवारा कुत्ता बन सकता है। धनवान के कुत्ते के रूप में, वह अत्यंत समृद्ध रूप से निवास करेगा। कभी-कभी पश्चिमी देशों में हम सुनते हैं कि एक मालिक अपने कुत्ते के लिए लाखों डॉलर अपनी वसीयत में छोड़ कर जाता है। निश्चय ही, अनेक कुत्ते बिना भोजन के सड़कों पर घुमते हैं। इसलिये, जीव के सःशर्त अस्तित्व की तुलना कुत्ते के अस्तित्व से करना उचित है। हालाँकि, एक बुद्धिमान मनुष्य समझ सकता है कि यदि उसे कुत्ते के समान जीवन जीना है, तो सबसे उत्तम होगा कि वह कृष्ण का कुत्ता बने। भौतिक जगत में एक कुत्ता कभी ऊँचा उठता है, तो कभी सड़कों पर होता है, किंतु भौतिक जगत में कृष्ण का कुत्ता सदा, शाश्वत रूप से प्रसन्न रहता है। अतः श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने गाया है, वैष्णव ठाकुर, तोमार कुकुर, बलिया जानह मोर । इस प्रकार भक्तिविनोद ठाकुर वैष्णव का कुत्ता बनना स्वीकार करते हैं। एक कुत्ता सदैव अपने मालिक के द्वार पर रहता है और मालिक के विपरीत किसी भी व्यक्ति को प्रवेश नहीं करने देता। इसी प्रकार, एक वैष्णव की सेवा में संलग्न होना चाहिए और उस उसे हर दृष्टिकोण से संतुष्ट करने का प्रयास करना चाहिए। जब तक कोई ऐसा नहीं करता है, वह आध्यात्मिक उन्नति नहीं कर सकता। आध्यात्मिक उन्नति के अतिरिक्त, भौतिक जगत में यदि कोई सद्गुणों को विकसित नहीं करता है, तो वह श्रेष्ठ ग्रहीय प्रणालियों में प्रवेश नहीं पा सकता है। जैसा कि भगवद्गीता में पुष्टि की गई है (14.18):

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्व-स्था

मध्ये तिष्ठन्ति राजसः

जघन्य-गुण-वृत्ति-स्था

अधो गच्छन्ति तामसः

"सत्व गुण में स्थित जीव धीरे-धीरे ऊपर उठकर उच्चतर ग्रहों में जाते हैं; रजो गुण में स्थित पृथ्वी लोक में निवास करते हैं; और तमोगुण में स्थित निम्नतर प्रजातियों में चले जाते हैं।"

विभिन्न ग्रहीय प्रणालियों में जीवन की अनेक विविधताएँ हैं, और यह सत्व, रज और तम गुणों को विकसित करने से प्राप्त होती हैं। यदि कोई सत्व गुण में है, तो वह उच्चतर प्रणालियों में जाता है; यदि रजोगुण में है, तो वह मध्यवर्ती प्रणालियों में रहता है; और यदि तमोगुण में है, तो उसे निम्नतर जीवन-प्रजातियों में धकेल दिया जाता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)