अतः श्री-कृष्ण-नामदि
न भवेद् ग्राह्यमिंद्रियैः
सेवनमुखे हि जिह्वादौ
स्वयं एव स्फुरति अद:
"कोई भी कृष्ण को नहीं समझ सकता जैसा वह भौतिक इंद्रियों का उपयोग करके है। हालाँकि, भगवान ने अपने भक्तों के सामने खुद को प्रकट किया, उनके प्रतिसत्तात्मक प्रेमपूर्ण सेवा के कारण उनसे प्रसन्न होकर उन्होंने उसे प्रस्तुत किया।"
चूंकि परम भगवान्, कृष्ण के नाम, रूप, गुण और गतिविधियों को भौतिक इंद्रियों द्वारा नहीं समझा जा सकता है, इसलिए उन्हें अधोक्षज भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है "इंद्रिय बोध से परे।" जब भक्तिमय गतिविधि से इंद्रियाँ पवित्र हो जाती हैं, तो भक्त भगवान् की कृपा से भगवान् के बारे में सब कुछ समझ जाता है। इस पद्य में शब्द पुंभ्भिर नंबिर वा क्रिया-गुणैः विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं क्योंकि भगवान्, कृष्ण, परम भगवान् के कई नाम, गतिविधियाँ और गुण हैं, हालाँकि उनमें से कोई भी भौतिक नहीं है। इस तथ्य के बावजूद कि ये सभी नाम, गतिविधियाँ और मनोरंजन शास्त्रों में वर्णित हैं और भक्तों द्वारा समझे जाते हैं, कर्मी (नियतिवादी) उन्हें नहीं समझ सकते। न ही ज्ञानी (मानसिक विचारक) उन्हें समझ सकते हैं। हालाँकि भगवान विष्णु के हजारों नाम हैं, कर्मी और ज्ञानी परम भगवान् के नामों को देवताओं और मनुष्यों के नामों के साथ रखते हैं। क्योंकि वे परम भगवान् के वास्तविक नाम को नहीं समझ सकते, इसलिए वे इसे मानते हैं कि किसी भी नाम को स्वीकार किया जा सकता है। उनका मानना है कि चूंकि परम सत्य अवैयक्तिक है, इसलिए वे उसे किसी भी नाम से पुकार सकते हैं। अन्यथा, वे कहते हैं, उनका कोई नाम नहीं है। यह सत्य नहीं है। यहाँ यह स्पष्ट रूप से कहा गया है: नाम्बिर वा क्रिया-गुणैः। भगवान के विशिष्ट नाम जैसे कि राम, कृष्ण, गोविंद, नारायण, विष्णु और अधोक्षज हैं। वास्तव में कई नाम हैं, लेकिन बद्ध आत्मा उन्हें समझ नहीं सकती है।
