श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  4.29.3 
योऽविज्ञाताहृतस्तस्य पुरुषस्य सखेश्वर: ।
यन्न विज्ञायते पुम्भिर्नामभिर्वा क्रियागुणै: ॥ ३ ॥
 
 
अनुवाद
जिसे मैंने अज्ञात कहा है, वह जीव का स्वामी और सच्चा मित्र, भगवान है। चूँकि जीव भौतिक नामों, कर्मों या गुणों के माध्यम से भगवान को नहीं जान सकते हैं, इसलिए वह बद्ध जीव के लिए हमेशा अज्ञात रहते हैं।
 
The Person whom I have called ignorant is the Supreme Lord, the Lord and eternal friend of the living entity. Since the living entity cannot know the Lord by material names, qualities or actions, He is therefore always unknown to the conditioned soul.
तात्पर्य
क्योंकि परम भगवान् को बद्ध आत्मा नहीं जानती है, इसलिए वैदिक साहित्य में अक्सर उन्हें निराकार, अविज्ञात या अवान-मानस-गोचर के रूप में वर्णित किया गया है। वास्तव में यह एक तथ्य है कि जहाँ तक उनके रूप, नाम, गुणवत्ता, मनोरंजनों या सामग्री का संबंध है, परम भगवान् को भौतिक इंद्रियों द्वारा नहीं पहचाना जा सकता। हालाँकि, जब कोई आध्यात्मिक रूप से उन्नत होता है, तो कोई परम भगवान् के नाम, रूप, गुणों, मनोरंजनों और सामग्री को समझ सकता है। इसकी पुष्टि भगवद्-गीता (18.55) में की गई है। भक्त्या मामभिजानाति यावान याश्चास्मि तत्त्वतः: कोई परम भगवान् को सत्य में तभी समझ सकता है जब वह भक्तिपूर्ण सेवा में लगा हो। धार्मिक और अधार्मिक गतिविधियों में लगे साधारण व्यक्ति भगवान् के रूप, नाम और गतिविधियों को नहीं समझ सकते। हालाँकि, भक्त भगवान् को कई मामलों में जान सकता है। वह समझ सकता है कि कृष्ण परम भगवान हैं, कि उनका पता गोलोक वृंदावन है और उनकी सभी गतिविधियाँ आध्यात्मिक हैं। क्योंकि भगवान के रूप और गतिविधियों को भौतिकवादी लोग नहीं समझ सकते, इसलिए उन्हें शास्त्रों में निराकार के रूप में वर्णित किया गया है, अर्थात वह व्यक्ति जिसके रूप को भौतिकवादी व्यक्ति नहीं जान सकता। इसका मतलब यह नहीं है कि परम भगवान् का कोई रूप नहीं है; इसका मतलब यह है कि इसे कर्मियों, या नियतिवादी कर्मियों द्वारा नहीं समझा जाता है। उनका रूप ब्रह्म-संहिता में सच्चिदानंद-विग्रह के रूप में वर्णित है। जैसा कि पद्म पुराण द्वारा पुष्टि की गई है:

अतः श्री-कृष्ण-नामदि

न भवेद् ग्राह्यमिंद्रियैः

सेवनमुखे हि जिह्वादौ

स्वयं एव स्फुरति अद:

"कोई भी कृष्ण को नहीं समझ सकता जैसा वह भौतिक इंद्रियों का उपयोग करके है। हालाँकि, भगवान ने अपने भक्तों के सामने खुद को प्रकट किया, उनके प्रतिसत्तात्मक प्रेमपूर्ण सेवा के कारण उनसे प्रसन्न होकर उन्होंने उसे प्रस्तुत किया।"

चूंकि परम भगवान्, कृष्ण के नाम, रूप, गुण और गतिविधियों को भौतिक इंद्रियों द्वारा नहीं समझा जा सकता है, इसलिए उन्हें अधोक्षज भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है "इंद्रिय बोध से परे।" जब भक्तिमय गतिविधि से इंद्रियाँ पवित्र हो जाती हैं, तो भक्त भगवान् की कृपा से भगवान् के बारे में सब कुछ समझ जाता है। इस पद्य में शब्द पुंभ्भिर नंबिर वा क्रिया-गुणैः विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं क्योंकि भगवान्, कृष्ण, परम भगवान् के कई नाम, गतिविधियाँ और गुण हैं, हालाँकि उनमें से कोई भी भौतिक नहीं है। इस तथ्य के बावजूद कि ये सभी नाम, गतिविधियाँ और मनोरंजन शास्त्रों में वर्णित हैं और भक्तों द्वारा समझे जाते हैं, कर्मी (नियतिवादी) उन्हें नहीं समझ सकते। न ही ज्ञानी (मानसिक विचारक) उन्हें समझ सकते हैं। हालाँकि भगवान विष्णु के हजारों नाम हैं, कर्मी और ज्ञानी परम भगवान् के नामों को देवताओं और मनुष्यों के नामों के साथ रखते हैं। क्योंकि वे परम भगवान् के वास्तविक नाम को नहीं समझ सकते, इसलिए वे इसे मानते हैं कि किसी भी नाम को स्वीकार किया जा सकता है। उनका मानना है कि चूंकि परम सत्य अवैयक्तिक है, इसलिए वे उसे किसी भी नाम से पुकार सकते हैं। अन्यथा, वे कहते हैं, उनका कोई नाम नहीं है। यह सत्य नहीं है। यहाँ यह स्पष्ट रूप से कहा गया है: नाम्बिर वा क्रिया-गुणैः। भगवान के विशिष्ट नाम जैसे कि राम, कृष्ण, गोविंद, नारायण, विष्णु और अधोक्षज हैं। वास्तव में कई नाम हैं, लेकिन बद्ध आत्मा उन्हें समझ नहीं सकती है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)