श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 28
 
 
श्लोक  4.29.28 
शुक्लात्प्रकाशभूयिष्ठाँल्लोकानाप्नोति कर्हिचित् ।
दु:खोदर्कान् क्रियायासांस्तम:शोकोत्कटान् क्‍वचित् ॥ २८ ॥
 
 
अनुवाद
जो सतोगुणी हैं, वे वैदिक आदेशों के अनुसार पुण्यकर्म करते हैं और इस तरह वे उच्च लोकों को जाते हैं जहाँ देवों का निवास है। वे पाप कर्मों से दूर रहते हैं और शुभ कर्मों में लगे रहते हैं। इस तरह वे धीरे-धीरे अपने गुणों को बढ़ाते हैं और अंत में मोक्ष प्राप्त करते हैं।

जो रजोगुणी हैं, वे मनुष्य लोक में विभिन्न प्रकार के उत्पादक काम करते हैं। वे अर्थ और काम की इच्छा से प्रेरित होकर कर्म करते हैं। वे अपने स्वार्थ के लिए काम करते हैं और दूसरों के सुख-दुख की चिंता नहीं करते। इस तरह वे अपने गुणों को बढ़ाते हैं और अंत में स्वर्ग प्राप्त करते हैं।

जो तमोगुणी हैं, वे विभिन्न प्रकार के कष्ट उठाते हैं और पशु जगत में वास करते हैं। वे अज्ञानता और अंधकार में रहते हैं। वे पाप कर्मों में लगे रहते हैं और दूसरों को दुख पहुँचाते हैं। इस तरह वे अपने गुणों को कम करते हैं और अंत में नरक प्राप्त करते हैं।
 
Those who are in the mode of goodness perform pious acts according to the Vedic injunctions and thus go to the higher regions where the devas reside. Those who are in the mode of passion perform various kinds of productive work in the human world. Similarly, men in the mode of ignorance suffer various kinds of miseries and live in the animal world.
तात्पर्य
तीनों प्रकार के लोक यानी स्वर्गलोक, मृत्युलोक और पाताल लोक में प्राणियों को उनके गुण-कर्म के आधार पर स्थान दिया जाता है | सात्विक गुण से प्रभावित प्राणियों को स्वर्गलोक के ब्रह्मलोक (सत्यलोक), तपोलोक, जनलोक और महर्लोक में जगह मिलती है। रजोगुण से प्रभावित प्राणियों को भूलोक और भुवरलोक में स्थान मिलता है। तमोगुण से प्रभावित प्राणियों को अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, पाताल या पशु-योनि में स्थान मिलता है। गुणात्मक रूप से, जीव परमात्मा के समान ही होता है, लेकिन अपनी भूल से, वह विभिन्न लोकों में भिन्न-भिन्न शरीरों को धारण करता है। इस समय, मानव समाज रजोगुण से प्रबल रूप से प्रभावित है, और परिणामस्वरूप, लोग बड़े-बड़े कारखानों में काम करने में लगे हुए हैं। वे भूल जाते हैं कि ऐसी जगहों पर रहना कितना कष्टदायी होता है। भगवद्गीता में ऐसी गतिविधियों को उग्र-कर्म यानी कष्टदायक कर्म कहा गया है। जो लोग कामगारों की ऊर्जा का उपयोग करते हैं, उन्हें पूंजीपति कहा जाता है, और जो वास्तव में काम करते हैं, उन्हें मजदूर कहा जाता है। वास्तव में, वे दोनों ही पूंजीपति हैं, और मजदूर रजोगुण और तमोगुण में रहते हैं। परिणाम यह होता है कि हमेशा कष्टदायी स्थिति बनी रहती है। इन लोगों के विपरीत वे लोग होते हैं जो सतोगुण से प्रभावित होते हैं - कर्मी और ज्ञानी। कर्मी वैदिक निर्देशों के तहत, खुद को उच्च लोकों में ऊपर उठाने का प्रयास करते हैं। ज्ञानी भगवान के अवैयक्तिक रूप ब्रह्म के अस्तित्व में विलीन होने का प्रयास करते हैं। इस तरह, जीवन की विभिन्न प्रजातियों में जीवित प्राणियों के सभी वर्ग इस भौतिक दुनिया में विद्यमान हैं। यह भौतिक दुनिया में श्रेष्ठ और निम्न जीवन-रूपों की व्याख्या करता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)