आधयो व्याधयस्तस्य सैनिका यवनाश्चरा: ।
भूतोपसर्गाशुरय: प्रज्वारो द्विविधो ज्वर: ॥ २३ ॥
एवं बहुविधैर्दु:खैर्दैवभूतात्मसम्भवै: ।
क्लिश्यमान: शतं वर्षं देहे देही तमोवृत: ॥ २४ ॥
प्राणेन्द्रियमनोधर्मानात्मन्यध्यस्य निर्गुण: ।
शेते कामलवान्ध्यायन्ममाहमिति कर्मकृत् ॥ २५ ॥
अनुवाद
यवनेश्वर (यमराज) के सेवक मृत्यु के सैनिक माने जाते हैं, जो शरीर और मन से जुड़े विभिन्न कष्टों के रूप में जाने जाते हैं। प्रज्वार दो तरह के बुखारों का प्रतीक है - बहुत ज़्यादा गरमी और बहुत ज़्यादा ठंड - जैसे टाइफाइड और निमोनिया। शरीर के अंदर मौजूद जीव कई सारे कष्टों से परेशान रहता है, जो ईश्वर की ओर से, दूसरे जीवों की ओर से और अपने ही शरीर और मन की ओर से आते हैं। हर तरह के कष्टों के बावजूद, जीव शरीर, मन और इंद्रियों की ज़रूरतों के अधीन रहता है और कई तरह की बीमारियों से जूझता रहता है। वह दुनिया का लुत्फ़ लेने की इच्छा के चलते कई योजनाओं में बह जाता है। निर्गुण (दिव्य) होने के बावजूद, जीव अपने अज्ञान के कारण अहंकार (मैं और मेरा) के चलते इन भौतिक कष्टों को स्वीकार कर लेता है। इस तरह वह इस शरीर में सौ साल तक रहता है।
The attendants of Yavneshvara (Yamraj) are called the soldiers of death, who are considered to be various afflictions related to the body and mind. Prajwar indicates two types of fevers—extreme heat and extreme cold—such as typhoid and pneumonia. The living being lying inside the body is disturbed by various afflictions, which are divine, material and related to his own body and mind. In spite of all kinds of afflictions, the living being gets carried away in various schemes by the desire to enjoy this world. Even though the living being is nirguna (divine), due to his ignorance, the living being accepts these material afflictions due to ego (I and mine). Thus he lives inside this body for a hundred years.
तात्पर्य
वेदों में बताया गया है: असंगो ह्य ayam पुरुषः: जीव वास्तव में भौतिक अस्तित्व से अलग है, क्योंकि आत्मा भौतिक नहीं है। भगवद-गीता में भी कहा गया है कि जीव श्रेष्ठ ऊर्जा है और भौतिक तत्व - पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु आदि - निम्न ऊर्जा हैं। भौतिक तत्वों को भिन्न या पृथक ऊर्जा के रूप में भी वर्णित किया गया है। जब आंतरिक या श्रेष्ठ ऊर्जा बाहरी ऊर्जा के संपर्क में आती है, तो यह कई कष्टों के अधीन हो जाती है। भगवद-गीता (2.14) में भगवान भी कहते हैं, मात्रा-स्पर्शस्तु कौन्तेय शीतोष्ण-सुख-दुःख-दाः: भौतिक शरीर के कारण, जीव कई कष्टों के अधीन है जो वायु, जल, अग्नि, अत्यधिक गर्मी, अत्यधिक ठंड, धूप, अत्यधिक भोजन, अस्वास्थ्यकर भोजन, शरीर के तीन तत्वों (कफ, पित्त और वायु) के अनियमित समायोजन इत्यादि के कारण होते हैं। आंतों, गले, मस्तिष्क और शरीर के अन्य भाग सभी प्रकार के रोगों से प्रभावित होते हैं जो इतने शक्तिशाली होते हैं कि वे जीव के लिए अत्यधिक दुख के स्रोत बन जाते हैं। हालाँकि, जीव इन सभी भौतिक तत्वों से अलग है। इस श्लोक में वर्णित दो प्रकार के बुखार को समकालीन भाषा में निमोनिया और टाइफाइड के रूप में समझाया जा सकता है। जब शरीर में अत्यधिक बुखार होता है, तो टाइफाइड और निमोनिया होता है, और उन्हें प्रज्वार के रूप में वर्णित किया जाता है। अन्य जीवित संस्थाओं द्वारा भी अन्य दुख भी उत्पन्न किए जाते हैं - राज्य कर वसूलता है, और कई चोर, बदमाश और धोखेबाज भी होते हैं। अन्य जीवित संस्थाओं द्वारा लाए गए दुखों को अधिभौतिक कहा जाता है। अकाल, महामारी, दुर्भिक्ष, युद्ध, भूकंप आदि के रूप में भी दुख हैं। ये देवताओं या हमारे नियंत्रण से बाहर के अन्य स्रोतों के कारण होते हैं। वास्तव में जीवित संस्थाओं के कई शत्रु हैं, और इन सभी का वर्णन यह बताने के लिए किया गया है कि यह भौतिक अस्तित्व कितना दयनीय है। भौतिक अस्तित्व के मूल दुख को जानकर, व्यक्ति को भौतिक चंगुल से बाहर निकलने और घर लौटने, वापस भगवान के पास जाने के लिए प्रेरित होना चाहिए। वास्तव में जीवित व्यक्ति इस भौतिक शरीर में बिल्कुल भी खुश नहीं है। शरीर के कारण, वह प्यास और भूख से पीड़ित होता है और मन, शब्दों, क्रोध, पेट, जननांगों, मलाशय आदि से प्रभावित होता है। बहुआयामी दुख केवल इसलिए जीवित व्यक्ति को घेर लेते हैं क्योंकि वह इस भौतिक दुनिया में अपनी इंद्रियों को संतुष्ट करने की इच्छा रखता है। यदि वह केवल इंद्रिय संतुष्टि की गतिविधियों से हट जाता है और अपनी इंद्रियों को प्रभु की सेवा में लगाता है, तो भौतिक अस्तित्व की सभी समस्याएं तुरंत कम हो जाएंगी। कृष्ण चेतना की उन्नति के साथ वह सभी कष्टों से मुक्त हो जाएगा, और शरीर त्यागने के बाद वह घर लौटेगा, वापस भगवान के पास जाएगा।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥