श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  4.29.22 
कालकन्या जरा साक्षाल्लोकस्तां नाभिनन्दति ।
स्वसारं जगृहे मृत्यु: क्षयाय यवनेश्वर: ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
जिसे कालकन्या कहा गया है, उसे वृद्धावस्था (जरा) समझना चाहिए। कोई भी वृद्धावस्था को स्वीकार नहीं करना चाहता, परंतु मृत्युराज, जो स्वयं मृत्यु हैं, वृद्धावस्था को अपनी बहन के रूप में स्वीकार करते हैं।
 
What is called Kala Kanya should be understood as old age (Jara). No one wants to accept old age, but the Yavanaraj, who is death personified, accepts Jara (old age) as his sister.
तात्पर्य
शरीर में बंधा हुआ जीव कालकन्या जरा को मृत्यु से पहले स्वीकार करता है। यवनेश्वर मृत्यु के प्रतीक यमराज हैं। यमराज के लोक में जाने से पहले जीवित इकाई यमराज की बहन यमराज को स्वीकार करती है। दुष्कर्म के कारण व्यक्ति यवन-राज और उनकी बहन के प्रभाव के अधीन हो जाता है। जो लोग कृष्णभावनामृत में हैं और नारद मुनि के निर्देशानुसार भक्ति सेवा में लगे हुए हैं वे यमराज और उनकी बहन यरा के प्रभाव के अधीन नहीं हैं। यदि कोई कृष्णभावनामृत है तो वह मृत्यु को जीत लेता है। भौतिक शरीर को छोड़ने के बाद, वह एक और शरीर को स्वीकार नहीं करता है जो भौतिक है, लेकिन घर वापस जाता है, वापस भगवान के पास। यह भगवद्-गीता (4.9) द्वारा सत्यापित है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)