श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  4.29.21 
संवत्सरश्चण्डवेग: कालो येनोपलक्षित: ।
तस्याहानीह गन्धर्वा गन्धर्व्यो रात्रय: स्मृता: ।
हरन्त्यायु: परिक्रान्त्या षष्ट्युत्तरशतत्रयम् ॥ २१ ॥
 
 
अनुवाद
जिसे पहले चण्डवेग यानी शक्तिशाली समय कहा गया था वह दिनों और रातों में विभाजित है, जिनके नाम गंधर्व और गंधर्वी हैं। शरीर का जीवनकाल दिनों और रातों के बीतने से क्रमशः कम होता जाता है, जिनकी संख्या 360 है।
 
What was earlier called Chandveg or powerful time is made up of day and night whose names are Gandharva and Gandharvi. The age of the body gradually decreases with the passing of days and nights whose number is 360.
तात्पर्य
परिक्रान्त्या शब्द का अर्थ है "यात्रा करना"। जीव एक वर्ष में जो 360 (या इससे अधिक) दिन और रात होते हैं, वह अपने रथ पर दिन-रात यात्रा करता रहता है। जीवन की प्रगति को जीवन के इन 360 दिनों और रातों को पूरा करने के लिए आवश्यक अनावश्यक श्रम के लिए लिया जाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)