श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 1b
 
 
श्लोक  4.29.1b 
भक्ति: कृष्णे दया जीवेष्वकुण्ठज्ञानमात्मनि ।
यदि स्यादात्मनो भूयादपवर्गस्तु संसृते: ॥ १ब ॥
 
 
अनुवाद
यदि कोई प्राणी कृष्णभक्ति में विकसित होता है और दूसरों पर दयालु होता है, और यदि उसका आत्म-साक्षात्कार का आध्यात्मिक ज्ञान पूर्ण होता है, तो उसे तुरंत भौतिक अस्तित्व के बंधन से मुक्ति प्राप्त हो जाएगी।
 
If a living being develops in devotion to Krishna and is compassionate to others, if his spiritual knowledge of Self-realization is perfect, he will soon attain liberation from the bondage of material existence.
तात्पर्य
इस श्लोक में "दया जीवैषु" शब्दों का अर्थ "दूसरे जीवों पर दया करना" है, यह दर्शाता है कि एक जीव को दूसरे जीवों पर दयालु होना चाहिए यदि वह आत्म-साक्षात्कार में प्रगति करना चाहता है। इसका अर्थ है कि उसे स्वयं को पूर्ण करके और एक शाश्वत सेवक के रूप में कृष्ण के पद को समझने के बाद इस ज्ञान का प्रचार करना चाहिए। इसका प्रचार करना ही जीवों पर वास्तविक दया दिखाना है। अन्य प्रकार के मानवीय कार्य शरीर के लिए अस्थायी रूप से लाभकारी हो सकते हैं, लेकिन क्योंकि एक जीव आत्मा है, अंततः कोई उसे केवल उसके आध्यात्मिक अस्तित्व का ज्ञान प्रकट करके ही वास्तविक दया दिखा सकता है। जैसा कि चैतन्य महाप्रभु कहते हैं, जीवर 'स्वरूप' हय - कृष्णर 'नित्य-दास': "प्रत्येक जीव मूल रूप से कृष्ण का सेवक है।" इस तथ्य को किसी को भी पूर्ण रूप से जानना चाहिए और इसे लोगों को प्रचार करना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति यह महसूस करता है कि वह कृष्ण का एक शाश्वत सेवक है लेकिन इसका प्रचार नहीं करता है, तो उसकी प्राप्ति अपूर्ण है। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर इसलिए गाते हैं, दुष्ट मन, तुम किसरा वैष्णव? प्रतिष्ठार तारे, निर्जनरा घरे, तव हरि-नाम केवल कैतव: "मेरे प्रिय मन, तुम किस तरह के वैष्णव हो? तुम केवल झूठी प्रतिष्ठा और भौतिक प्रतिष्ठा के लिए एकांत स्थान में ही हरि कृष्ण मंत्र का जाप कर रहे हो।" इस प्रकार, जो लोग प्रचार नहीं करते हैं, उनकी आलोचना की जाती है। वृंदावन में कई वैष्णव हैं जो प्रचार करना पसंद नहीं करते हैं; वे मुख्य रूप से हरिदास ठाकुर की नकल करने का प्रयास करते हैं। हालांकि, एकांत स्थान पर उनके तथाकथित जप का वास्तविक परिणाम यह है कि वे सोते हैं और महिलाओं और धन के बारे में सोचते हैं। इसी तरह, कोई व्यक्ति जो केवल मंदिर पूजा में संलग्न होता है, लेकिन लोगों के हितों को नहीं देखता है या भक्तों को नहीं पहचान सकता है, उसे कनिष्ठाधिकारी कहा जाता है:

"अर्चायाम एव हरये

पूजां यः श्रद्धयेहते

न तद्-भक्तेषु चान्येषु

स भक्तः प्रकृतिः स्मृतः (भागवत 11.2.47)

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)