श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 1a-2a
 
 
श्लोक  4.29.1a-2a 
सर्वेषामेव जन्तूनां सततं देहपोषणे ।
अस्ति प्रज्ञा समायत्ता को विशेषस्तदा नृणाम् ॥ १अ ॥
लब्ध्वेहान्ते मनुष्यत्वं हित्वा देहाद्यसद्ग्रहम् ।
आत्मसृत्या विहायेदं जीवात्मा स विशिष्यते ॥ २अ ॥
 
 
अनुवाद
शरीर, पत्नी और बच्चों का पालन-पोषण करने की इच्छा जानवरों के समाज में भी देखी जा सकती है। ऐसे कार्यों का प्रबंधन करने के लिए जानवरों में पूरी बुद्धि होती है। यदि कोई व्यक्ति केवल इसमें ही उन्नत हो जाता है, तो फिर उसके और और जानवर के बीच क्या अंतर रह जाता है? व्यक्ति को यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि विकास क्रम में कई जन्मों के बाद यह मानव जीवन प्राप्त होता है। जो बुद्धिमान व्यक्ति स्थूल और सूक्ष्म शरीर की देह से जुड़े विचारों को त्याग देता है, वह आध्यात्मिक ज्ञान के प्रकाश से परमेश्वर की तरह ही प्रमुख आत्मा बन जाएगा।
 
The desire to maintain the body, wife and children is also seen in animal society. Animals have the intelligence to manage such activities. If man is advanced in this aspect only, then what is the difference between him and animals? Man should understand well that in the process of evolution, this human life is attained after many births. The wise man who gives up the bodily consciousness of the gross and subtle bodies will become a supreme soul like God with the light of spiritual knowledge.
तात्पर्य
यह कहा जाता है कि मानव एक तार्किक प्राणी है, लेकिन इस श्लोक से हम यह भी समझ सकते हैं कि तर्कशीलता पशुओं के जीवन में भी मौजूद है। जब तक तर्कशीलता मौजूद नहीं है तब तक एक जानवर इतनी मेहनत करके अपने शरीर का कैसे भरण-पोषण कर सकता है? यह कहना कि जानवर तर्कहीन हैं सच नहीं है; हालाँकि उनकी तर्कशीलता बहुत उन्नत नहीं है। किसी भी परिस्थिति में, हम उन्हें तर्कशीलता से वंचित नहीं कर सकते हैं। मुद्दा यह है कि व्यक्ति को अपने कारण का उपयोग भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व को समझने के लिए करना चाहिए, क्योंकि यही मानव जीवन की पूर्णता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)