एता ब्रह्माण्ड भारी' अनंता जीव-गणा
चौराशी-लक्ष योनि ते करे भ्रमणा
जीव संपूर्ण ब्रह्मांड में भटक रहा है और भिन्न ग्रहों पर भिन्न प्रजातियों में जन्म ले रहा है। इस प्रकार वह ऊपर और नीचे होता रहता है, लेकिन यह वास्तविक प्रगति नहीं है। वास्तविक प्रगति इस भौतिक संसार से पूरी तरह से बाहर निकलना है। जैसा कि भगवद-गीता (8.16) में कहा गया है:
आब्रह्म-भुवनाल लोकाः
पुनः आर्विर्तिनोऽर्जुन
माम् उपेत्य तु कौन्तेय
पुनर् जन्म न विद्यते
"भौतिक संसार के उच्चतम ग्रह से निम्नतम तक, सभी दुख के स्थान हैं जहाँ बार-बार जन्म और मृत्यु होती है। लेकिन जो मेरा निवास प्राप्त कर लेता है, हे कुंती के पुत्र, उसे फिर कभी जन्म नहीं लेना पड़ता।" भले ही किसी को ब्रह्मलोक में, जो ब्रह्मांड का सबसे ऊँचा ग्रह है, पदोन्नत कर दिया जाए, उसे फिर से निम्न लोक प्रणालियों में नीचे आना पड़ता है। और इस प्रकार वह भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव में हमेशा ऊपर और नीचे भटकता रहता है। मोह में पड़े रहते हुए, वह सोचता है कि वह प्रगति कर रहा है। वह एक हवाई जहाज की तरह है जो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से बाहर निकलने में असमर्थ, दिन-रात पृथ्वी की परिक्रमा करता रहता है। वास्तव में कोई प्रगति नहीं है क्योंकि हवाई जहाज पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से नियंत्रित होता है।
जैसे एक राजा रथ पर बैठा होता है, वैसे ही जीव शरीर में बैठा होता है। बैठने का स्थान हृदय है, और जीव वहाँ बैठकर अस्तित्व के संघर्ष में लगा रहता है, जो हमेशा प्रगति के बिना ही चलता रहता है। नरोत्तम दास ठाकुर के शब्दों में:
कर्म-काण्ड, ज्ञान-काण्ड, केवल विषेर भांड,
अमृत बोलिया येबा खाया
नाना योनि सदा फिर, कदर्य भक्षण करे,
तार जन्म अधः-पाते याया
फलदायक कार्य और मानसिक अनुमान के प्रभाव के कारण जीव बहुत कठिन संघर्ष करता है और जीवन के बाद जीवन में एक अलग प्रकार का शरीर प्राप्त करता है। वह हर प्रकार की बकवास खाता है और इन्द्रिय सुखों की गतिविधियों से अभिशप्त होता है। यदि कोई वास्तव में जीवन में प्रगति करना चाहता है, तो उसे कर्म-काण्ड और ज्ञान-काण्ड, फलदायक कार्य और मानसिक अनुमानों के तरीकों को छोड़ देना चाहिए। कृष्ण चेतना में अटल रहकर, व्यक्ति जन्म और मृत्यु की उलझन और अस्तित्व के व्यर्थ संघर्ष से मुक्त हो सकता है। इन श्लोकों में "मृग-तृष्णाम् प्रधावति" शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि जीव इन्द्रिय सुखों की प्यास से प्रभावित होता है। वह एक हिरण की तरह है जो पानी की तलाश करने के लिए रेगिस्तान में जाता है। एक रेगिस्तान में एक जानवर बस व्यर्थ ही पानी की तलाश करता है। बेशक रेगिस्तान में पानी नहीं है, और जानवर पानी खोजने के प्रयास में बस अपनी जान कुर्बान कर देता है। हर कोई भविष्य की ख़ुशी के लिए योजना बना रहा है, यह सोचकर कि अगर वह किसी तरह किसी निश्चित बिंदु पर पहुँच जाता है तो वह ख़ुश हो जाएगा। वास्तविकता में, हालाँकि, जब वह उस बिंदु पर आता है तो वह देखता है कि वहाँ कोई ख़ुशी नहीं है। फिर वह आगे और आगे दूसरे बिंदु पर जाने की योजना बनाता है। इसे मृग-तृष्णा कहा जाता है, और इसका आधार इस भौतिक संसार में इन्द्रिय सुख है।
