श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 18-20
 
 
श्लोक  4.29.18-20 
देहो रथस्त्विन्द्रियाश्व: संवत्सररयोऽगति: ।
द्विकर्मचक्रस्त्रिगुणध्वज: पञ्चासुबन्धुर: ॥ १८ ॥
मनोरश्मिर्बुद्धिसूतो हृन्नीडो द्वन्द्वकूबर: ।
पञ्चेन्द्रियार्थप्रक्षेप: सप्तधातुवरूथक: ॥ १९ ॥
आकूतिर्विक्रमो बाह्यो मृगतृष्णां प्रधावति ।
एकादशेन्द्रियचमू: पञ्चसूनाविनोदकृत् ॥ २० ॥
 
 
अनुवाद
नारद मुनि ने आगे कहा : जिसको मैंने रथ कहा था, वह वास्तव में शरीर है और इन्द्रियाँ वे घोड़े हैं, जो इस रथ को खींचते हैं। ज्यों-ज्यों वर्षानुवर्ष समय बीतता जाता है, ये घोड़े बिना किसी अवरोध के दौड़ते तो हैं, लेकिन वास्तव में वे कोई प्रगति नहीं कर पाते। पाप और पुण्य इस रथ के दो पहिए हैं और प्रकृति के तीनों गुण इस रथ की ध्वजाएँ हैं। पाँच प्रकार के प्राण जीव के बंधन हैं और मन को रस्सी माना जाता है। बुद्धि इस रथ की सारथी है। हृदय रथ में बैठने का स्थान है और हर्ष और पीड़ा जैसे द्वंद्व जुए हैं। सातों तत्व (धातुएँ) इस रथ के आवरण हैं और पाँचों कर्मेन्द्रियाँ इसकी पाँच प्रकार की बाह्य गतियाँ हैं। ग्यारहों इन्द्रियाँ सैनिक हैं। इन्द्रिय-सुख में मग्न रहने के कारण रथ पर आसीन जीव झूठी अभिलाषाओं को पूरा करने के लिए लालायित रहता है और जन्म-जन्मांतर तक इन्द्रियसुख के पीछे दौड़ता रहता है।
 
Sage Narad further said: What I called a chariot is actually the body. The senses are the horses that pull the chariot. As time passes year after year, these horses run without any obstruction, but in reality they are unable to make any progress. Sin and virtue are the two wheels of this chariot. The three gunas of nature are the flags of this chariot. Five types of life force become the bondage of the living being and the mind is considered the rope. Intellect is the charioteer of this chariot. The heart is the seat in the chariot and the opposites like happiness and pain are the yokes. The seven elements (dhatu) are the covering of this chariot, the five organs of action are its five types of external movements and the eleven senses are the soldiers. Being engrossed in sense-pleasures, the living being seated on the chariot boasts to fulfill false desires and keeps running after sense-pleasures from birth to birth.
तात्पर्य
जीवात्मा का इन्द्रिय सुखों में उलझना इन श्लोकों में बहुत अच्छी प्रकार से समझाया गया है। "संवत्सर" शब्द जिसका अर्थ "समय का बितना" है, महत्वपूर्ण है। दिन-दर-दिन, सप्ताह-दर-सप्ताह, पखवाड़ा-दर-पखवाड़ा, महीना-दर-महीना, साल-दर-साल, जीव रथ की गति में उलझता जाता है। रथ दो पहियों पर टिका होता है, जो धर्मी और अधर्मी कर्म हैं। जीव अपने धर्मी और अधर्मी कर्मों के अनुसार जीवन में एक विशेष प्रकार के शरीर में एक निश्चित स्थिति प्राप्त करता है, लेकिन भिन्न शरीरों में उसका प्रवेश प्रगति नहीं समझी जानी चाहिए। वास्तविक प्रगति भगवद-गीता (4.9) में समझाई गई है। त्याक्त्वा देहं पुनर् जन्म नैति: व्यक्ति तभी वास्तविक प्रगति करता है जब उसे दूसरा भौतिक शरीर नहीं लेना पड़ता। जैसा कि चैतन्य-चरितामृत (मध्य 19.138) में कहा गया है:

एता ब्रह्माण्ड भारी' अनंता जीव-गणा

चौराशी-लक्ष योनि ते करे भ्रमणा

जीव संपूर्ण ब्रह्मांड में भटक रहा है और भिन्न ग्रहों पर भिन्न प्रजातियों में जन्म ले रहा है। इस प्रकार वह ऊपर और नीचे होता रहता है, लेकिन यह वास्तविक प्रगति नहीं है। वास्तविक प्रगति इस भौतिक संसार से पूरी तरह से बाहर निकलना है। जैसा कि भगवद-गीता (8.16) में कहा गया है:

आब्रह्म-भुवनाल लोकाः

पुनः आर्विर्तिनोऽर्जुन

माम् उपेत्य तु कौन्तेय

पुनर् जन्म न विद्यते

"भौतिक संसार के उच्चतम ग्रह से निम्नतम तक, सभी दुख के स्थान हैं जहाँ बार-बार जन्म और मृत्यु होती है। लेकिन जो मेरा निवास प्राप्त कर लेता है, हे कुंती के पुत्र, उसे फिर कभी जन्म नहीं लेना पड़ता।" भले ही किसी को ब्रह्मलोक में, जो ब्रह्मांड का सबसे ऊँचा ग्रह है, पदोन्नत कर दिया जाए, उसे फिर से निम्न लोक प्रणालियों में नीचे आना पड़ता है। और इस प्रकार वह भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों के प्रभाव में हमेशा ऊपर और नीचे भटकता रहता है। मोह में पड़े रहते हुए, वह सोचता है कि वह प्रगति कर रहा है। वह एक हवाई जहाज की तरह है जो पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र से बाहर निकलने में असमर्थ, दिन-रात पृथ्वी की परिक्रमा करता रहता है। वास्तव में कोई प्रगति नहीं है क्योंकि हवाई जहाज पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण से नियंत्रित होता है।

जैसे एक राजा रथ पर बैठा होता है, वैसे ही जीव शरीर में बैठा होता है। बैठने का स्थान हृदय है, और जीव वहाँ बैठकर अस्तित्व के संघर्ष में लगा रहता है, जो हमेशा प्रगति के बिना ही चलता रहता है। नरोत्तम दास ठाकुर के शब्दों में:

कर्म-काण्ड, ज्ञान-काण्ड, केवल विषेर भांड,

अमृत बोलिया येबा खाया

नाना योनि सदा फिर, कदर्य भक्षण करे,

तार जन्म अधः-पाते याया

फलदायक कार्य और मानसिक अनुमान के प्रभाव के कारण जीव बहुत कठिन संघर्ष करता है और जीवन के बाद जीवन में एक अलग प्रकार का शरीर प्राप्त करता है। वह हर प्रकार की बकवास खाता है और इन्द्रिय सुखों की गतिविधियों से अभिशप्त होता है। यदि कोई वास्तव में जीवन में प्रगति करना चाहता है, तो उसे कर्म-काण्ड और ज्ञान-काण्ड, फलदायक कार्य और मानसिक अनुमानों के तरीकों को छोड़ देना चाहिए। कृष्ण चेतना में अटल रहकर, व्यक्ति जन्म और मृत्यु की उलझन और अस्तित्व के व्यर्थ संघर्ष से मुक्त हो सकता है। इन श्लोकों में "मृग-तृष्णाम् प्रधावति" शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं क्योंकि जीव इन्द्रिय सुखों की प्यास से प्रभावित होता है। वह एक हिरण की तरह है जो पानी की तलाश करने के लिए रेगिस्तान में जाता है। एक रेगिस्तान में एक जानवर बस व्यर्थ ही पानी की तलाश करता है। बेशक रेगिस्तान में पानी नहीं है, और जानवर पानी खोजने के प्रयास में बस अपनी जान कुर्बान कर देता है। हर कोई भविष्य की ख़ुशी के लिए योजना बना रहा है, यह सोचकर कि अगर वह किसी तरह किसी निश्चित बिंदु पर पहुँच जाता है तो वह ख़ुश हो जाएगा। वास्तविकता में, हालाँकि, जब वह उस बिंदु पर आता है तो वह देखता है कि वहाँ कोई ख़ुशी नहीं है। फिर वह आगे और आगे दूसरे बिंदु पर जाने की योजना बनाता है। इसे मृग-तृष्णा कहा जाता है, और इसका आधार इस भौतिक संसार में इन्द्रिय सुख है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)