अन्त:पुरं च हृदयं विषूचिर्मन उच्यते ।
तत्र मोहं प्रसादं वा हर्षं प्राप्नोति तद्गुणै: ॥ १६ ॥
अनुवाद
अंत:पुर हृदय के लिए एक संकेत है। विषूचिन्, जिसका अर्थ है "सब जगह जाना," मन को इंगित करता है। मन के भीतर ही जीव प्रकृति के गुणों का आनंद लेता है। ये प्रभाव कभी भ्रम उत्पन्न करते हैं, तो कभी संतोष और कभी उल्लास।
The inner chamber indicates the heart. Vishuchin (everywhere) indicates the mind. The living being enjoys the qualities of nature within the mind. All these effects sometimes create attachment, and sometimes satisfaction and joy.
तात्पर्य
भौतिक अस्तित्व में जीव की बुद्धि और समझ भौतिक प्रकृति के दोषों से प्रभावित होती है, और भौतिक दोषों के संग के अनुसार, मन इधर-उधर जाने का आदी हो जाता है। भौतिक प्रकृति के दोषों के प्रभाव के अनुसार हृदय संतुष्टि, हर्ष या भ्रम महसूस करता है। वास्तव में उसकी भौतिक स्थिति में जीव निष्क्रिय रहता है। यह भौतिक प्रकृति का दोष है जो मन और हृदय पर कार्य करता है। परिणाम जीव द्वारा भोगे या सहे जाते हैं। यह भगवद-गीता में स्पष्ट रूप से कहा गया है (3.27):
prakṛteḥ kriyamāṇāni
guṇaiḥ karmāṇi sarvaśaḥ
ahaṅkāra-vimūḍhātmā
kartāham iti manyate
"भौतिक प्रकृति के तीन दोषों के प्रभाव में, भ्रमित आत्मा अपने आप को उन कार्यों का कर्ता मानती है जो वास्तव में प्रकृति द्वारा किए जाते हैं।"
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥