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bhagavat 4.29.15: जब यह कहा जाता है कि पुरञ्जन वैशस जाता है, तो इसका अर्थ है कि वह नरक जाता है। उसके साथ लुब्धक रहता है, जो गुदा नामक कर्मेन्द्रिय है। इसके पूर्व मैंने दो अंधे साथियों का भी उल्लेख किया था। इन हाथ तथा पाँव समझना चाहिए। जीव हाथ तथा पाँव की सहायता से सभी प्रकार के कार्य करता और इधर-उधर जाता है।   |   bhagavat अध्याय 4.29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप   ।   bhagavat स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति   ।   श्रीमद् भागवतम Srimad Bhagavatam | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  4.29.15 
वैशसं नरकं पायुर्लुब्धकोऽन्धौ तु मे श‍ृणु ।
हस्तपादौ पुमांस्ताभ्यां युक्तो याति करोति च ॥ १५ ॥
 
 
अनुवाद
जब यह कहा जाता है कि पुरञ्जन वैशस जाता है, तो इसका अर्थ है कि वह नरक जाता है। उसके साथ लुब्धक रहता है, जो गुदा नामक कर्मेन्द्रिय है। इसके पूर्व मैंने दो अंधे साथियों का भी उल्लेख किया था। इन हाथ तथा पाँव समझना चाहिए। जीव हाथ तथा पाँव की सहायता से सभी प्रकार के कार्य करता और इधर-उधर जाता है।
 
When it is said that Puranjan goes to Vaishas, ​​it means that he goes to hell. Lubdhaka, the organ of action called the anus, remains with him. Earlier I had also mentioned two blind companions. These should be understood as hands and feet. With the help of hands and feet the living being performs all kinds of tasks and moves here and there.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)