ग्रामक नामक नगर, जहाँ आसुरी द्वार (शिश्न) के निचले रास्ते से पहुँचा जाता है, का लक्ष्य स्त्री-संभोग है जो उन मूर्ख और दुष्ट सामान्य लोगों के लिए बेहद आकर्षक है। गर्भवती होने की क्षमता, दुर्मद कहलाती है और गुदा को निर्ऋति कहा जाता है।
The city called Gramak, which is reached through the lower demoniac door (penis), is for sexual intercourse with women which is very tempting for ordinary men who are absolutely foolish and cunning. The genitals are called Durmad and the anus is called Nirriti.
तात्पर्य
जब दुनिया भ्रष्ट होती है, सभ्यता राक्षसी हो जाती है और आम आदमी गुदा और जननांग को सभी गतिविधि के केंद्रों के रूप में बहुत गंभीरता से लेता है। भारत के वृंदावन जैसे पवित्र स्थान में भी, अज्ञानी लोग गुदा और जननांग के इस व्यवसाय को आध्यात्मिक गतिविधि के रूप में प्रस्तुत करते हैं। ऐसे लोगों को सहजिया कहा जाता है। उनके दर्शन के अनुसार, यौन भोग के माध्यम से व्यक्ति स्वयं को आध्यात्मिक प्लेटफॉर्म पर ऊपर उठा सकता है। हालाँकि, श्रीमद-भागवतम के इन छंदों से, हम समझते हैं कि यौन संतुष्टि की इच्छाएँ अरवक के लिए हैं, जो कि मनुष्यों में सबसे निचले हैं। इन बदमाशों और मूर्खों को सुधारना बहुत मुश्किल है। आखिरकार, इन छंदों में आम आदमी की यौन इच्छाओं की निंदा की गई है। दुर्मद शब्द का अर्थ है "गलत तरीके से निर्देशित", और निरृति का अर्थ है "पापपूर्ण गतिविधि"। हालाँकि यह स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि सामान्य दृष्टिकोण से भी यौन भोग घृणित और भ्रमित है, लेकिन सहजिया फिर भी खुद को आध्यात्मिक गतिविधियों का संचालन करने वाले भक्तों के रूप में प्रस्तुत करते हैं। इस कारण से, वृंदावन अब बुद्धिमान लोगों द्वारा नहीं देखा जाता है। अक्सर हमसे पूछा जाता है कि हमने अपना केंद्र वृंदावन में क्यों बनाया है। बाहरी दृष्टिकोण से, यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि सहजिया गतिविधियों के कारण वृंदावन पतनशील हो गया है, फिर भी आध्यात्मिक दृष्टिकोण से, वृंदावन एकमात्र ऐसा स्थान है जहां इन सभी पापियों को जन्म लेकर कुत्तों, सूअरों और बंदरों के रूप में सुधारा जा सकता है। वृंदावन में कुत्ते, सूअर या बंदर के रूप में रहने से, जीवित प्राणी को अगले जन्म में आध्यात्मिक मंच पर ऊपर उठाया जा सकता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥