श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  4.29.13 
प्रवृत्तं च निवृत्तं च शास्त्रं पञ्चालसंज्ञितम् ।
पितृयानं देवयानं श्रोत्राच्छ्रुतधराद्‌व्रजेत् ॥ १३ ॥
 
 
अनुवाद
नारद मुनि ने आगे कहा: दक्षिण पंचाल नामक नगरी सकाम कर्म में भोग की विधि यानी प्रवृत्ति-मार्ग को बताने वाले शास्त्रों की ओर इशारा करती है। दूसरी नगरी, जिसका नाम उत्तर पंचाल है, निवृत्ति मार्ग यानी सकाम कर्म को घटाने और ज्ञान को बढ़ाने वाले मार्ग के बारे में बताने वाले शास्त्रों के लिए प्रयुक्त है। जीव को ज्ञान की प्राप्ति दो कानों के माध्यम से होती है और कुछ लोगों को पितृलोक और कुछ को देवलोक में भेजा जाता है। यह सब दोनों कानों द्वारा ही संभव हो पाता है।
 
Narad Muni further said: The city called Dakshin Panchal indicates the scriptures that tell the method of enjoyment in Sakaam Karma, i.e. Pravritti Marg. The other city called Uttara Panchal is used for the scriptures that tell Nivriti Marg – the path to reduce Sakaam Karma and increase knowledge. The soul receives knowledge through two ears and some people go to Pitriloka and some to Devloka. All this is possible through both the ears.
तात्पर्य
वेदों को श्रुति के रूप में जाना जाता है, और श्रवण द्वारा प्राप्त ज्ञान को श्रुत-धारा कहा जाता है। जैसा कि भगवद्-गीता में कहा गया है, कोई भी सिर्फ श्रवण की प्रक्रिया से देवताओं के ग्रहों या पितृ (पूर्वजों) के ग्रहों, या यहाँ तक कि वैकुंठ ग्रहों में पदोन्नत हो सकता है। इन बातों को पिछले अध्यायों में पहले ही समझाया जा चुका है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)