श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 29: नारद तथा राजा प्राचीनबर्हि के मध्य वार्तालाप  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  4.29.10 
खद्योताविर्मुखी चात्र नेत्रे एकत्र निर्मिते ।
रूपं विभ्राजितं ताभ्यां विचष्टे चक्षुषेश्वर: ॥ १० ॥
 
 
अनुवाद
वर्णित खद्योत और आविर्मुखी नाम के दो द्वार एक ही स्थान पर पास में स्थित दो नेत्र हैं। विभ्राजित नामक नगरी को रूप समझा जाना चाहिए। इस प्रकार, दोनों नेत्र सदैव विभिन्न प्रकार के रूपों को देखने के कार्य में तत्पर रहते हैं।
 
The two gates described as Khadyot and Avirmukhi are two eyes situated side by side in the same place. The city named Vibhrajit should be understood as the form. In this way both the eyes are always busy in seeing different types of forms.
तात्पर्य
उन दो आँखों को प्रकाश जैसी चमकीली चीज़ों का आकर्षण रहता है। कभी-कभी हम देखते हैं कि छोटी-छोटी हियाँट आग की चमक से आकर्षित होकर उसके अंदर चले जाते हैं। इसी तरह जीवित प्राणी की दो आँखें भी चमकीले और सुंदर रूपों की ओर आकर्षित होती हैं। वे उन रूपों में उलझ जाते हैं, ठीक उसी तरह जैसे कि जंतु आग से आकर्षित हो जाते हैं।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)