त्रिभिर् गुण-मयैर् भावैर
एभिः सर्वमिदं जगत्
मोहितं नाभिजानाति
माम एभ्यः परम अव्ययम
"तीनों गुणों (सात्विक, राजसी और तामसी) से भ्रमित होकर पूरा जगत मुझे नहीं पहचानता है, जो इन गुणों से परे और अविनाशी हूँ।" आमतौर पर लोग भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों में मग्न रहते हैं और इसलिए व्यावहारिक रूप से यह समझने में असमर्थ रहते हैं कि इस भौतिक सृष्टि में सभी भौतिकवादी गतिविधियों के पीछे भगवान कृष्ण हैं। आमतौर पर जब लोग पापपूर्ण या धार्मिक गतिविधियों में लिप्त होते हैं, तब वे भक्ति सेवा के ज्ञान में परिपूर्ण नहीं होते हैं। नारद मुनि द्वारा राजा बृहस्मान को सुनाई गई रूपक कथा विशेष रूप से बद्ध आत्माओं को भक्ति सेवा में संलग्न करने के लिए कही गई है। पूरी कहानी, जो रूपकात्मक रूप से बताई गई है, भक्ति सेवा में लगे हुए व्यक्ति द्वारा आसानी से समझ ली जाती है, लेकिन जो लोग भक्ति सेवा में नहीं बल्कि इंद्रिय सुख में लिप्त होते हैं वे इसे पूरी तरह से समझ नहीं पाते हैं। राजा बृहस्मान ने इसे स्वीकार किया है। यह उनतीसवाँ अध्याय बताता है कि महिलाओं के प्रति बहुत ज्यादा मोह होने पर व्यक्ति अगले जन्म मेें स्त्री बन जाता है, लेकिन जो व्यक्ति भगवान कृष्ण या उनके प्रतिनिधि के साथ जुड़ता है, वह सभी भौतिक आसक्तियों से मुक्त हो जाता है और इस तरह वह मुक्त हो जाता है।
