विशीर्णां स्वपुरीं वीक्ष्य प्रतिकूलाननादृतान् ।
पुत्रान् पौत्रानुगामात्याञ्जायां च गतसौहृदाम् ॥ ७ ॥
अनुवाद
तब राजा पुरञ्जन ने देखा कि उसकी नगरी अस्त-व्यस्त हो गई थी और उसके पुत्र, पौत्र, नौकर और मंत्री सभी क्रमश: उसके विरोधी बनते जा रहे थे। उसने यह भी देखा कि उसकी पत्नी स्नेहशून्य और अन्यमनस्क हो रही थी।
Then King Purañjana saw that his city had become chaotic and his sons, grandsons, servants and ministers were gradually turning against him. He also saw that his wife was becoming unloving and absent-minded.
तात्पर्य
जब कोई व्यक्ति अशक्त हो जाता है, तो उसकी इंद्रियाँ और अंग कमजोर हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में, वे अब उसके नियंत्रण में नहीं रहते। इंद्रियाँ और इंद्रिय-विषयों उसका विरोध शुरु कर देते हैं। जब कोई व्यक्ति विपरीत परिस्थिति में होता है, तो उसके परिवार के सदस्य--उसके बेटे, पोते और पत्नी--भी उसका अपमान करने लगते हैं। वे अब घर के मुखिया के आदेशानुसार नहीं चलते। जिस प्रकार हम अपनी इंद्रियों का उपयोग संगत संतुष्टि के लिए करना चाहते हैं, उसी तरह इंद्रियों को भी शरीर से अपनी शक्ति चाहिए होती है। एक पुरुष सुख के लिए एक परिवार रखता है और ठीक उसी तरह परिवार के सदस्य परिवार के मुखिया से सुख की मांग करते हैं। जब उन्हें पर्याप्त धन नहीं मिलता, तो वे उदासीन हो जाते हैं और उसके आदेशों और इच्छाओं को नजरअंदाज कर देते हैं। यह सब उसके कंजूस (कृपण) होने के कारण होता है। छठे श्लोक में प्रयुक्त शब्द कृपण शब्द ब्राह्मण शब्द का विरोधी है। मानव जीवन में व्यक्ति को ब्राह्मण बनना चाहिए, जिसका मतलब है कि व्यक्ति को निरपेक्ष सत्य, ब्रह्म की संवैधानिक स्थिति को समझना चाहिए और फिर वैष्णव के रूप में उसकी सेवा में संलग्न होना चाहिए। मानव जीवन में हमें यह सुविधा मिलती है, लेकिन अगर हम इस अवसर का उचित उपयोग नहीं करते हैं, तो हम कृपण बन जाते हैं। कृपण वह होता है जो धन प्राप्त करता है, लेकिन उसे उचित रूप से खर्च नहीं करता। मानव जीवन विशेष रूप से ब्रह्म को समझने, ब्राह्मण बनने के लिए है, और अगर हम इसका उचित उपयोग नहीं करते हैं, तो हम कृपण बने रहते हैं। हम वास्तव में देख सकते हैं कि जब किसी के पास धन होता है लेकिन वह उसे खर्च नहीं करता है, तो वह कृपण रहता है और कभी भी खुश नहीं रहता। ठीक इसी प्रकार, जब इंद्रिय-संतुष्टि के कारण किसी की बुद्धि खराब हो जाती है, तो वह अपने पूरे जीवन में कृपण ही रहता है।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥