तद विद्धि प्रणिपातेन
परिप्रश्नेन सेवया
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं
ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः
"बस एक आध्यात्मिक गुरु के पास जाकर सत्य जानने की कोशिश करो। उससे विनम्रतापूर्वक पूछताछ करो और उसकी सेवा करो। आत्म-साक्षात्कारी आत्मा तुम्हें ज्ञान प्रदान कर सकती है क्योंकि उसने सत्य को देखा है।" (भगवत गीता 4.34)
इस प्रकार व्यक्ति को एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु का चयन करना होगा और अपनी मूल चेतना के प्रति ज्ञान प्राप्त करना होगा। इस तरह व्यक्तिगत आत्मा समझ सकती है कि वह हमेशा परमात्मा के अधीनस्थ है। जैसे ही वह अधीनस्थ रहने से इनकार करता है और भोक्ता बनने की कोशिश करता है, वह अपनी भौतिक स्थिति शुरू करता है। जब वह एक व्यक्तिगत मालिक या भोक्ता होने की इस भावना को छोड़ देता है, तो वह अपनी मुक्त अवस्था में स्थित हो जाता है। इस श्लोक में 'स्वस्थः', जिसका अर्थ 'अपनी मूल स्थिति में स्थित' है, शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। जब कोई श्रेष्ठता के अपने अवांछित रवैये को त्याग देता है, तो वह अपनी मूल स्थिति में स्थित हो जाता है। 'तद-व्यभिचारण' शब्द भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह इंगित करता है कि जब कोई अवज्ञा के कारण भगवान से अलग हो जाता है, तो उसकी वास्तविक भावना खो जाती है। फिर, कृष्ण और गुरु की कृपा से, वह अपनी मुक्त स्थिति में ठीक से स्थित हो सकता है। ये श्लोक श्रील नारद मुनि द्वारा बोले गए हैं, और उन्हें बोलने का उनका उद्देश्य हमारी चेतना को पुनर्जीवित करना है। यद्यपि जीवित इकाई और परमात्मा गुणवत्ता में एक हैं, फिर भी व्यक्तिगत आत्मा को परमात्मा के निर्देश का पालन करना होता है। यही मुक्ति की स्थिति है।
