miche māyāra vaśe, yāccha bhese’,
khāccha hābuḍubu, bhāi
jīva kṛṣṇa-dāsa, e viśvāsa,
karle ta’ āra duḥkha nāi
“हे प्रिय जीवो, तुम भौतिक प्रकृति की लहरों के बहाव में बह रहे हो। कभी तुम सतह पर होते हो, तो कभी तुम डूब रहे होते हो। इस तरह तुम्हारा शाश्वत जीवन नष्ट हो रहा है। यदि तुम केवल कृष्ण को पकड़ लो और उनके चरण-कमलों की शरण लो, तो तुम पुनः सभी दुखदायी भौतिक स्थितियों से मुक्त हो जाओगे।”
इस पद में "सुहृत्" यानी "शुभचिंतक" और "तवा" यानी "तुम्हारा", शब्द बहुत महत्वपूर्ण हैं। कोई व्यक्ति का तथाकथित पति, संबंधी, पुत्र, पिता या जो कोई भी हो, वास्तव में शुभचिंतक नहीं हो सकता। वास्तव में एकमात्र सच्चे शुभचिंतक स्वयं कृष्ण हैं, जैसा कि कृष्ण भगवद्गीता (5.29) में कहते हैं: suhṛdaṁ sarva-bhūtānām। समाज, मित्रता, प्रेम और शुभचिंतक सभी विभिन्न शरीरों में बंद होने का परिणाम मात्र होते हैं। मनुष्य को इस बात को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए और उस शारीरिक बंधन से बाहर निकलने का प्रयास करना चाहिए, जिसमें उसे जन्म के बाद जन्म फेंका जा रहा है। मनुष्य को भगवान कृष्ण की शरण लेनी चाहिए और अपने घर, भगवान के पास लौटना चाहिए।
