श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  4.28.55 
स त्वं विहाय मां बन्धो गतो ग्राम्यमतिर्महीम् ।
विचरन् पदमद्राक्षी: कयाचिन्निर्मितं स्त्रिया ॥ ५५ ॥
 
 
अनुवाद
प्रिय मित्र, तुम अभी भी मेरे वही मित्र हो। जबसे तुमने मेरा साथ छोड़ा है, तुम अधिकाधिक भौतिकवादी बनते चले गये हो और मेरी तरफ देखे बिना इस संसार में, जिसे किसी स्त्री ने बनाया है, विभिन्न रूपों में भटकते रहे हो।
 
O friend, you are my same friend. Since you left me, you have become more and more materialistic and without looking at me you have been roaming around in different forms in this world created by a woman.
तात्पर्य
जब जीव नीचे गिरता है, तो वह भौतिक दुनिया में जाता है, जिसे भगवान की बाहरी ऊर्जा द्वारा बनाया गया था। इस बाहरी ऊर्जा को यहाँ "कुछ महिला" या प्रकृति के रूप में वर्णित किया गया है। यह भौतिक दुनिया भौतिक तत्वों से बनी है, महत-तत्त्व द्वारा आपूर्ति की गई सामग्री, कुल भौतिक ऊर्जा। इस बाहरी ऊर्जा द्वारा बनाई गई भौतिक दुनिया बंधी हुई आत्मा का तथाकथित घर बन जाती है। इस भौतिक दुनिया के भीतर बंधी हुई आत्मा अलग-अलग अपार्टमेंट या अलग-अलग शारीरिक रूपों को स्वीकार करती है और फिर घूमती रहती है। कभी वह उच्च ग्रह प्रणालियों में भ्रमण करता है और कभी निचली प्रणालियों में। कभी वह जीवन की उच्च प्रजातियों में भ्रमण करता है और कभी निम्न प्रजातियों में। वह अनादि काल से इस भौतिक ब्रह्मांड में भटक रहा है। जैसा कि श्री चैतन्य महाप्रभु ने समझाया है:

ब्रह्मांड भ्रमित कोन भाग्यवान जीवा

गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाया भक्ति-लता-बीजा

जीव कई प्रकार की प्रजातियों में भटकता है, लेकिन वह भाग्यशाली होता है जब वह एक बार फिर से अपने मित्र से मिलता है, या तो व्यक्तिगत रूप से या उसके प्रतिनिधि के माध्यम से।

वास्तव में, यह कृष्ण ही हैं जो सभी जीवों को घर लौटने, भगवान के पास वापस जाने की व्यक्तिगत रूप से सलाह देते हैं। कभी-कभी कृष्ण अपने प्रतिनिधि को भेजते हैं, जो कृष्ण के संदेश को देते हुए, सभी जीवों से घर लौटने, भगवान के पास वापस जाने का अनुरोध करता है। दुर्भाग्य से जीव भौतिक आनंद से इतना अधिक जुड़ा होता है कि वह कृष्ण या उनके प्रतिनिधि के निर्देशों को बहुत गंभीरता से नहीं लेता है। इस भौतिक प्रवृत्ति को इस श्लोक में ग्राम्य-मति:, इंद्रिय संतुष्टि के रूप में उल्लेख किया गया है। महिम शब्द का अर्थ है "इस भौतिक दुनिया के भीतर"। इस भौतिक दुनिया के भीतर सभी जीव कामुक प्रवृत्ति वाले हैं। फलस्वरूप वे विभिन्न प्रकार के शरीरों में उलझ जाते हैं और भौतिक अस्तित्व की पीड़ा को झेलते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)