श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 54
 
 
श्लोक  4.28.54 
हंसावहं च त्वं चार्य सखायौ मानसायनौ ।
अभूतामन्तरा वौक: सहस्रपरिवत्सरान् ॥ ५४ ॥
 
 
अनुवाद
हे मेरे मधुर मित्र, मैं और तुम दोनों हंसों के समान हैं। हम दोनों एक ही मानसरोवर जैसे हृदय में साथ-साथ वास करते हैं, यद्यपि हम हजारों वर्षों से साथ-साथ रह रहे हैं, किन्तु फिर भी हम अपने मूल निवास से बहुत दूर हैं।
 
O friend, you and I are both like swans. We live together in the same heart which is like Manasarovar, although we have been living together for thousands of years. But still we are very far from our original home.
तात्पर्य
जीव एंव परमेश्वर का मूल निवास आध्यात्मिक जगत है। आध्यात्मिक जगत में परमेश्वर एंव जीव साथ-साथ बहुत ही शांतिपूर्ण तरीके से रहते हैं। चूँकि जीव हमेशा प्रभु की सेवा में ही लगा रहता है, इसलिए वो अपने आध्यात्मिक जगत में आनंदपूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं। हालाँकि, जब जीव स्वयं का आनंद लेना चाहता है तो वो भौतिक जगत में गिर जाता है। यहाँ तक कि जब वो उस अवस्था में भी होता है, तो भी प्रभु उसके अंदर परमात्मा, उसके अंतरंग मित्र के रूप में विद्यमान रहते हैं। अपनी भूलने की बीमारी के कारण, जीव को इस बात की जानकारी नहीं है कि परमप्रभु परमात्मा के रूप में उसके साथ है। इस तरह जीव हर युग में स्थित बना रहता है। हालाँकि प्रभु उसके साथ एक मित्र के रूप में उसके साथ रहते हैं, लेकिन जीव, भौतिक अस्तित्व की भूलने की बीमारी के कारण, उन्हें पहचान नहीं पाता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)