जब ब्राह्मण ने उस महिला से पूछा कि फर्श पर लेटा हुआ व्यक्ति कौन है, तो उसने उत्तर दिया कि वह उसका आध्यात्मिक गुरु है और वह उसकी अनुपस्थिति में क्या करें, इस बारे में वह हैरान है। ऐसे समय में परमात्मा तुरंत प्रकट होता है, बशर्ते भक्त आध्यात्मिक गुरु के निर्देशों का पालन करके हृदय से शुद्ध हो। एक निष्ठावान भक्त जो आध्यात्मिक गुरु के निर्देशों का पालन करता है, निश्चित रूप से अपने हृदय से परमात्मा से प्रत्यक्ष निर्देश प्राप्त करता है। इस प्रकार एक निष्ठावान भक्त को हमेशा सीधे या परोक्ष रूप से आध्यात्मिक गुरु और परमात्मा द्वारा मदद की जाती है। यह चैतन्य-चरितामृत में पुष्टि की गई है: गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाया भक्ति-लता-बीजा। यदि भक्त अपने आध्यात्मिक गुरु की ईमानदारी से सेवा करता है, तो कृष्ण स्वतः ही प्रसन्न हो जाते हैं। यस्य प्रसादाद भागवत-प्रसाद: : आध्यात्मिक गुरु को संतुष्ट करके, व्यक्ति स्वतः ही कृष्ण को संतुष्ट करता है। इस प्रकार भक्त आध्यात्मिक गुरु और कृष्ण दोनों से समृद्ध हो जाता है। परमात्मा सदा जीव की मित्र है और सदैव उसके साथ रहता है। इस भौतिक जगत के बनने से पहले भी परमात्मा सदा जीव की सहायता के लिए तत्पर रहा है। इसलिए यहाँ कहा गया है, येनाग्रे विचकार्था। 'अग्रे' शब्द का अर्थ है "सृष्टि से पहले"। इस प्रकार परमात्मा सृष्टि से पहले से ही जीव के साथ है।
