श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  4.28.52 
ब्राह्मण उवाच
का त्वं कस्यासि को वायं शयानो यस्य शोचसि ।
जानासि किं सखायं मां येनाग्रे विचचर्थ ह ॥ ५२ ॥
 
 
अनुवाद
ब्राह्मण ने पूछा: तुम कौन हो? तुम किसकी पत्नी या पुत्री हो? यहाँ लेटा हुआ पुरुष कौन है? ऐसा लगता है कि तुम इस मृत शरीर के लिए विलाप कर रही हो। क्या तुम मुझे नहीं पहचानतीं? मैं तुम्हारा शाश्वत सखा हूँ। तुम्हें याद होगा कि पहले तुमने कई बार मुझसे परामर्श लिया है।
 
The Brahman asked thus: Who are you? Whose wife or daughter are you? Who is the man lying here? It appears that you are mourning for this dead body. Do you not recognize me? I am your eternal friend. You will remember that you have consulted me many times before.
तात्पर्य
जब किसी व्यक्ति का कोई रिश्तेदार मरता है, तो त्याग स्वतः ही दिखाई देता है। हर किसी के हृदय में विराजमान परमात्मा से परामर्श तभी संभव है जब कोई भौतिक मोह के दोष से पूरी तरह मुक्त हो जाए। जो व्यक्ति ईमानदार और पवित्र होता है, उसे अपने हृदय में विराजमान परम व्यक्तित्व भगवान से परामर्श करने का अवसर मिलता है। परमात्मा हमेशा चैत्य-गुरु, भीतर का आध्यात्मिक गुरु होता है, और वह बाहरी रूप से एक व्यक्ति के सामने शिक्षक और दीक्षा देने वाले आध्यात्मिक गुरु के रूप में आता है। भगवान हृदय में निवास कर सकते हैं, और वह किसी व्यक्ति के सामने भी प्रकट होकर उसे निर्देश दे सकते हैं। इस प्रकार आध्यात्मिक गुरु हृदय में विराजमान परमात्मा से भिन्न नहीं है। एक निर्मल आत्मा या सजीव इकाई को परमात्मा से आमने-सामने मिलने का अवसर मिल सकता है। जिस तरह किसी को अपने हृदय में परमात्मा से परामर्श करने का मौका मिलता है, उसी तरह उसे वास्तव में उसके सामने स्थित परमात्मा को देखने का भी मौका मिलता है। तब वह परमात्मा से सीधे निर्देश ले सकता है। यह शुद्ध भक्त का कर्तव्य है: वास्तविक आध्यात्मिक गुरु को देखना और हृदय में परमात्मा से परामर्श करना।

जब ब्राह्मण ने उस महिला से पूछा कि फर्श पर लेटा हुआ व्यक्ति कौन है, तो उसने उत्तर दिया कि वह उसका आध्यात्मिक गुरु है और वह उसकी अनुपस्थिति में क्या करें, इस बारे में वह हैरान है। ऐसे समय में परमात्मा तुरंत प्रकट होता है, बशर्ते भक्त आध्यात्मिक गुरु के निर्देशों का पालन करके हृदय से शुद्ध हो। एक निष्ठावान भक्त जो आध्यात्मिक गुरु के निर्देशों का पालन करता है, निश्चित रूप से अपने हृदय से परमात्मा से प्रत्यक्ष निर्देश प्राप्त करता है। इस प्रकार एक निष्ठावान भक्त को हमेशा सीधे या परोक्ष रूप से आध्यात्मिक गुरु और परमात्मा द्वारा मदद की जाती है। यह चैतन्य-चरितामृत में पुष्टि की गई है: गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाया भक्ति-लता-बीजा। यदि भक्त अपने आध्यात्मिक गुरु की ईमानदारी से सेवा करता है, तो कृष्ण स्वतः ही प्रसन्न हो जाते हैं। यस्य प्रसादाद भागवत-प्रसाद: : आध्यात्मिक गुरु को संतुष्ट करके, व्यक्ति स्वतः ही कृष्ण को संतुष्ट करता है। इस प्रकार भक्त आध्यात्मिक गुरु और कृष्ण दोनों से समृद्ध हो जाता है। परमात्मा सदा जीव की मित्र है और सदैव उसके साथ रहता है। इस भौतिक जगत के बनने से पहले भी परमात्मा सदा जीव की सहायता के लिए तत्पर रहा है। इसलिए यहाँ कहा गया है, येनाग्रे विचकार्था। 'अग्रे' शब्द का अर्थ है "सृष्टि से पहले"। इस प्रकार परमात्मा सृष्टि से पहले से ही जीव के साथ है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)