श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 48
 
 
श्लोक  4.28.48 
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ राजर्षे इमामुदधिमेखलाम् ।
दस्युभ्य: क्षत्रबन्धुभ्यो बिभ्यतीं पातुमर्हसि ॥ ४८ ॥
 
 
अनुवाद
हे राजर्षि, उठो, उठो, देखो, “जल से घिरी यह पृथ्वी चोरों और तथाकथित राजाओं से भरी पड़ी है।” संसार बड़ी भयभीत है। तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम इसकी रक्षा करो।
 
O King, get up, get up, see, “This earth surrounded by water is full of thieves and so-called kings.” This world is very frightened. It is your duty to protect it.
तात्पर्य
जब भी कोई आचार्य भगवान या उनके प्रतिनिधि के श्रेष्ठ आदेशों का पालन करते हुए आता है, वह भगवद्-गीता में घोषित धर्म के सिद्धांतों को स्थापित करता है। धर्म का अर्थ है भगवान के आदेशों का पालन करना। जब कोई भगवान को समर्पित हो जाता है तब से ही धार्मिक सिद्धांत शुरू होते हैं। आचार्य का कर्तव्य है कि बोनोफेड धार्मिक प्रणाली का प्रसार करे और सभी को सर्वोच्च भगवान के आगे झुकने के लिए प्रेरित करे। भक्ति सेवा को समर्पित करना, विशेष रूप से सुनना, जप करना और याद करना जैसे नौ काम करके कोई भी धार्मिक सिद्धांतों का पालन करता है। दुर्भाग्य से, जब आचार्य गायब हो जाता है, तो धूर्त और गैर भक्त इसका फायदा उठाते हैं और तुरंत ही स्वामी, योगी, परोपकारी, कल्याणकारी कार्यकर्ता आदि के नाम पर अनधिकृत सिद्धांतों को पेश करना शुरू कर देते हैं। वास्तव में, मानव जीवन का उद्देश्य भगवान के आदेशों का पालन करना है, और यह भगवद्-गीता (9.34) में कहा गया है:

मान-मना भव मद्-भक्तो

मद्-याजी माँ नमस्करु

माँ एवैष्यसि युक्त्वंव

आत्मानं मत-परायणः

"अपने दिमाग को हमेशा मेरे बारे में सोचने में लगाएं और मेरे भक्त बने। नमस्कार करें और मेरी पूजा करें। मुझमें पूरी तरह से लीन होकर, निश्चित रूप से आप मेरे पास आएंगे"।

मानव समाज का मुख्य व्यवसाय हर समय भगवान के बारे में सोचना, उनके भक्त बनना, भगवान की पूजा करना और उनके आगे झुकना है। आचार्य, भगवान के अधिकृत प्रतिनिधि, इन सिद्धांतों को स्थापित करता है, लेकिन जब वह गायब हो जाता है, तो चीजें फिर से अव्यवस्थित हो जाती हैं। आचार्य के परिपूर्ण शिष्य आध्यात्मिक गुरु के निर्देशों का ईमानदारी से पालन करके स्थिति को सुधारने का प्रयास करते हैं। इस समय व्यावहारिक रूप से पूरी दुनिया बदमाशों और गैर-भक्तों से डरती है; इसलिए इस कृष्णभावनामृत आंदोलन को अधार्मिक सिद्धांतों से दुनिया को बचाने के लिए शुरू किया गया है। दुनिया में वास्तविक शांति और खुशी लाने के लिए हर किसी को इस आंदोलन का सहयोग करना चाहिए।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)