श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 46
 
 
श्लोक  4.28.46 
यदा नोपलभेताङ्‌घ्रावूष्माणं पत्युरर्चती ।
आसीत्संविग्नहृदया यूथभ्रष्टा मृगी यथा ॥ ४६ ॥
 
 
अनुवाद
जब उसने पतिदेव के चरण दबाये तो अनुभव हुआ कि उनके पैर अब गर्म नहीं हैं, अत: वह समझ गई कि उन्होंने शरीर छोड़ दिया है। पतिदेव के बिना वह चिंतित होने लगीं। उनके बिना वह उस मृगनयनी सी लगीं जो अपने प्रिय के बिना अप्रिय हुई है।
 
While she was massaging her husband's feet she felt that her feet were no longer warm, so she understood that she had already left this body. She was extremely worried when she was left alone. Without her husband's company she began to feel like a deer that has been separated from her husband.
तात्पर्य
जैसे ही शरीर के अंदर खून और हवा का प्रवाह रुकता है, तब यह समझना चाहिए कि शरीर में आत्मा नहीं है। खून का प्रवाह रुकने पर हाथों और पैरों में गर्मी नहीं रहती है। किसी व्यक्ति के जीवित या मृत होने का पता उसके दिल की धड़कन और हाथों और पैरों के ठंडे होने से पता चलता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)