श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 38
 
 
श्लोक  4.28.38 
तपसा विद्यया पक्‍वकषायो नियमैर्यमै: ।
युयुजे ब्रह्मण्यात्मानं विजिताक्षानिलाशय: ॥ ३८ ॥
 
 
अनुवाद
पूजा, तप साधना और नियमों के पालन से राजा मलयध्वज ने अपनी इंद्रियों, प्राण और चेतना पर विजय प्राप्त की। इस प्रकार उन्होंने हर चीज़ को सर्वोच्च ब्रह्म (कृष्ण) के केंद्र बिंदु पर स्थिर कर दिया।
 
By worship, penance and following rules, King Malayadhwaj conquered his senses, life and consciousness. In this way, he fixed everything on the central point in the form of Parabrahma (Krishna).
तात्पर्य
जब कभी भी ब्रह्म शब्द प्रकट होता है, अवैयक्तिकवादी इसे निराकार प्रकाश, ब्रह्मज्योति मानते हैं। वास्तव में, परब्रह्म, सर्वोच्च ब्रह्म, कृष्ण है, वासुदेव है। जैसा कि भगवद-गीता (7.19) में कहा गया है, "वासुदेवः सर्वमिति:" वासुदेव निराकार ब्रह्म के रूप में हर जगह विस्तारित हैं। कोई अपने मन को किसी निराकार "कुछ" पर स्थिर नहीं कर सकता है। इसलिये भगवद गीता (12.5) कहती है "क्लेशो ऽधिकतरो तेषामव्यक्तासक्त-चेतसाम्:" जिनके मन सर्वोच्च के अव्यक्त, निराकार गुण से जुड़े होते हैं, उन्नति उनके लिये बहुत कष्टदायी है।" फलस्वरूप, जब यहाँ कहा गया है कि राजा मलयध्वज ने अपना मन ब्रह्म पर स्थिर किया, "ब्रह्म" का मतलब सर्वोच्च भगवान, वासुदेव है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)