श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 35-36
 
 
श्लोक  4.28.35-36 
तत्र चन्द्रवसा नाम ताम्रपर्णी वटोदका ।
तत्पुण्यसलिलैर्नित्यमुभयत्रात्मनो मृजन् ॥ ३५ ॥
कन्दाष्टिभिर्मूलफलै: पुष्पपर्णैस्तृणोदकै: ।
वर्तमान: शनैर्गात्रकर्शनं तप आस्थित: ॥ ३६ ॥
 
 
अनुवाद
कुलालांचल प्रान्त में चंद्रवसा, ताम्रपर्णी और वटोडका नाम की तीन नदियाँ थीं। राजा मलयध्वज प्रतिदिन इन पवित्र नदियों में स्नान के लिए जाता था। इस तरह, उसने बाहर और अंदर दोनों तरफ से अपने आपको पवित्र रखा। वह नदियों में स्नान करता और जड़, बीज, पत्ते, फूल, जड़ें, फल, और घास खाकर और पानी पीकर कठोर तप करता था। अंतत: वह बहुत पतला और कमजोर हो गया।
 
There were three rivers named Chandravasa, Tamraparni and Vatodaka in the Kulachal region. King Malayadhwaj used to go to these holy rivers and take bath every day. In this way he purified himself from inside and outside. He used to take bath and eat tubers, seeds, leaves, flowers, roots, fruits and grass and drink water. In this way he started doing hard penance. In the end he became very emaciated.
तात्पर्य
निश्चित रूप से यह देख सकते हैं कि कृष्ण भावनामृत में उन्नति के लिए व्यक्ति को अपने शरीर के वजन को नियंत्रित करना चाहिए। यदि व्यक्ति बहुत मोटा हो जाता है, तो यह मान लेना चाहिए कि वह अध्यात्मिक रूप से उन्नति नहीं कर रहा है। श्रील भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने अपने मोटे शिष्यों की कड़ी आलोचना की थी। विचार यह है कि जो कृष्ण भावनामृत में उन्नति करने का इरादा रखता है, उसे बहुत अधिक नहीं खाना चाहिए। भक्त पहले तीर्थयात्राओं पर जंगलों, ऊंची पहाड़ियों या पहाड़ों पर जाते थे, लेकिन इन दिनों ऐसी कठोर तपस्या संभव नहीं है। इसके बजाय व्यक्ति को केवल प्रसाद खाना चाहिए और आवश्यकता से अधिक नहीं। वैष्णव कैलेंडर के अनुसार, एकादशी और भगवान और उनके भक्तों के प्रकट होने और विलुप्त होने के दिन जैसे कई उपवास होते हैं। इन सभी का उद्देश्य शरीर के भीतर की चर्बी को कम करना है ताकि व्यक्ति वांछित से अधिक न सोए और निष्क्रिय और आलसी न बने। भोजन में अधिक लिप्त होने से आदमी जरूरत से ज्यादा सोएगा। जीवन का यह मानवीय रूप तपस्या के लिए है, और तपस्या का अर्थ है कामुकता, भोजन सेवन आदि को नियंत्रित करना। इस तरह आध्यात्मिक गतिविधि के लिए समय बचाया जा सकता है, और व्यक्ति बाहरी और आंतरिक दोनों तरह से खुद को शुद्ध कर सकता है। इस प्रकार शरीर और मन दोनों को शुद्ध किया जा सकता है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)