जैसे रात्रि में चाँदनी चंद्रमा के पीछे-पीछे चलती है, वैसे ही राजा मलयध्वज के कुलाचल चले जाने पर उनके पीछे-पीछे उनकी पत्नी अपने पति के प्रेम में पगलाई हुई, घर-गृहस्थी, पुत्र-परिवार सभी को त्यागकर चली गई।
Just like the moonlight follows the moon in the night, in the same way, as soon as King Malayadhwaj went to his abode, his enamoured wife with intoxicating eyes, in spite of having a house and a son, gave up all the pleasures and joined him.
तात्पर्य
ठीक वैसे ही जैसे वानप्रस्थ अवस्था में पत्नी पति का अनुसरण करती है, उसी तरह जब आध्यात्मिक गुरु निरजन-भजन के लिए निवृत हो जाते हैं, तो कुछ उनके निपुण भक्त उनके अनुसरण में जाते हैं और उनकी व्यक्तिगत सेवा में संलग्न होते हैं। दूसरे शब्दों में, जो लोग पारिवारिक जीवन के बहुत शौकीन हैं, उन्हें आध्यात्मिक गुरु की सेवा में आगे आना चाहिए और समाज, मित्रता और प्रेम द्वारा दिए गए तथाकथित सुख को त्याग देना चाहिए। इस बारे में उनके गुरव-अष्टक में श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर का एक पद महत्वपूर्ण है: यस्य प्रसादाद भगवत्-प्रसादः। एक शिष्य को हमेशा याद रखना चाहिए कि आध्यात्मिक गुरु की सेवा से वह कृष्ण चेतना में आसानी से उन्नति कर सकता है। सभी शास्त्रों में अनुशंसा की जाती है कि आध्यात्मिक गुरु को प्रसन्न करने और उनकी प्रत्यक्ष सेवा करने से ही व्यक्ति भक्ति सेवा की उच्चतम पूर्ण अवस्था प्राप्त कर सकता है। इस छंद में मदिरेक्षणा शब्द भी महत्वपूर्ण है। श्रील जीव गोस्वामी ने अपने संदर्भ में समझाया है कि मदिरा शब्द का अर्थ "नशीला" होता है। यदि किसी की आँखें देवता को देखने पर नशे में हो जाती हैं, तो उसे मदिरेक्षण कहा जा सकता है। रानी वैदर्भी की आँखें बहुत आकर्षक थीं, ठीक वैसे ही किसी की आँखें मदिरेक्षण होती हैं जब वह मंदिर के देवता को देखने में संलग्न होती हैं। जब तक कोई निपुण भक्त नहीं होता, वह मंदिर में देवता पर अपनी आँखें नहीं जमा सकता।
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥