श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  4.28.33 
विभज्य तनयेभ्य: क्ष्मां राजर्षिर्मलयध्वज: ।
आरिराधयिषु: कृष्णं स जगाम कुलाचलम् ॥ ३३ ॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद, राजा मलयध्वज ने अपना पूरा राज्य अपने बेटों में बाँट दिया। तब, पूरी लगन से भगवान कृष्ण की पूजा करने के लिए वह कुलचल नाम की एकांत जगह पर चले गए।
 
After this, Rajarshi Malayadhwaj divided his entire kingdom among his sons. Then he went to a secluded place called Kulachal to worship Lord Krishna with full devotion.
तात्पर्य
महाराज मलयध्वज निश्चय ही महा भगवत, श्रेष्ठ भक्त थे। उन्होंने भक्तिमय सेवा का अनुष्ठान करके भक्तिपंथ के प्रसार के लिए अनेक पुत्रों और शिष्यों को जन्म दिया था (श्रवणं कीर्तनं विष्णोः)। वास्तव में, पूरे विश्व का विभाजन ऐसे ही शिष्यों के बीच हो जाना चाहिए; प्रत्येक को कृष्णभावनामृत के पंथ का प्रचार करने में ही लगा रहना चाहिए। दूसरे शब्दों में, जब शिष्य बड़े हो जाएँ और प्रचार करने में सक्षम हो जाएँ, तो आध्यात्मिक गुरु को संन्यास ले लेना चाहिए और एकाकी जगह पर बैठकर लेखन और निर्जन भजन का कार्य करना चाहिए। इसका अर्थ है कि एकांत स्थान पर मौन रूप से बैठकर भक्ति सेवा करना। यह निर्जन भजन, जो परमेश्वर की मौन आराधना है, एक नवोदित भक्त के लिए सम्भव नहीं है। श्रील भक्तिसिद्धांत्त सरस्वती ठाकुर ने कभी किसी नवोदित भक्त को भक्ति सेवा में लगाने के लिए एकांत स्थान में जाने की सलाह नहीं दी। वास्तव में, उन्होंने इस संबंध में एक गीत भी लिखा है:

दुष्ट मन, तुमी किसरा वैष्णव?

प्रतिष्ठार तारे, निर्जनरा घरे,

तूवा हरिनाम केवल कैतव

"हे मेरे मन, तू किस प्रकार का भक्त है। केवल सस्ती प्रशंसा के लिए तू एकाकी स्थानों पर बैठता है और हरि कृष्ण महामंत्र का जाप करने का ढोंग करता है, लेकिन यह सब धोखा है।" इस प्रकार, भक्तिसिद्धांत सरस्वती ठाकुर ने समर्थन किया कि एक कुशल आध्यात्मिक गुरु के दिशा-निर्देशन में प्रत्येक भक्त पूरे विश्व में भक्तिपंथ, कृष्णभावनामृत का प्रचार करे। केवल तभी जब कोई परिपक्व हो जाएँ, वह एकांत स्थान पर बैठ सकते हैं और पूरे विश्व में प्रचार करने से संन्यास ले सकते हैं। इस उदाहरण का अनुसरण करते हुए, इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर कृष्णा कॉन्शियसनेस के भक्त अब विश्व के विभिन्न हिस्सों में प्रचारकों के रूप में सेवा प्रदान करते हैं। अब वे आध्यात्मिक गुरु को सक्रिय प्रचार कार्य से संन्यास लेने की अनुमति दे सकते हैं। आध्यात्मिक गुरु के जीवन के अंतिम चरण में, आध्यात्मिक गुरु के भक्तों को प्रचार गतिविधियाँ अपने हाथ में लेनी चाहिए। इस प्रकार, आध्यात्मिक गुरु एकांत स्थान पर बैठ सकते हैं और निर्जन भजन कर सकते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)