यह सभ्यता की सिद्ध प्रणाली है। मानव जीवन का रूप विशेष रूप से भगवान की प्राप्ति के लिए है। यदि कोई जीवन की शुरुआत से ही कृष्ण भावना की प्रक्रिया को नहीं अपना पाता है, तो उसे जीवन के अंतिम छोर पर इन सिद्धांतों को स्वीकार करने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। दुर्भाग्य से, बचपन में भी कोई प्रशिक्षण नहीं होता है, और न ही कोई अंत में अपने पारिवारिक जीवन को छोड़ सकता है। पुरंजना शहर के साथ भी यही स्थिति है, जो इन छंदों में लाक्षणिक रूप से वर्णित है।
