श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 29
 
 
श्लोक  4.28.29 
उपयेमे वीर्यपणां वैदर्भीं मलयध्वज: ।
युधि निर्जित्य राजन्यान् पाण्ड्य: परपुरञ्जय: ॥ २९ ॥
 
 
अनुवाद
यह निश्चित किया गया कि राजा विदर्भ की पुत्री वैदर्भी का विवाह अति शक्तिशाली व्यक्ति मलयध्वज से होगा, जो पाण्डुदेश का निवासी था। उसने अन्य राजकुमारों को हराकर राजा विदर्भ की पुत्री से विवाह कर लिया।
 
It was decided that King Vidarbha's daughter Vaidarbhi should be married to a very powerful man named Malayadhwaj who was a resident of Pandu country. He defeated the other princes and married King Vidarbha's daughter.
तात्पर्य
क्षत्रियों में किसी राजकुमारी को कुछ शर्तों के तहत अर्पित करना प्रथा है। उदाहरण के लिए, द्रौपदी का विवाह उसी व्यक्ति से किया गया था जो उस मछली के प्रतिबिंब को देखकर ही उसे तीर से छेद सकता था। कृष्ण ने अपनी रानियों में से एक से सात बलवान सांडों को जीतने के बाद विवाह किया। वैदिक प्रणाली एक राजा की पुत्री को कुछ शर्तों के तहत अर्पित करने की है। विदर्भ की पुत्री वैदर्भी को एक महान भक्त और शक्तिशाली राजा को अर्पित किया गया था। चूंकि राजा मलयध्वज एक शक्तिशाली राजा और महान भक्त दोनों थे, उन्होंने सभी आवश्यकताओं को पूरा किया। मलयध्वज नाम एक ऐसे महान भक्त का प्रतीक है जो मलय पर्वत की तरह दृढ़ खड़ा रहता है और अपने प्रचार के माध्यम से अन्य भक्तों को भी उसी तरह दृढ़ बनाता है। ऐसा महाभागवत सभी अन्य लोगों के विचारों पर हावी हो सकता है। एक दृढ़ भक्त सभी अन्य आध्यात्मिक अवधारणाओं, अर्थात् ज्ञान, कर्म और योग के ख़िलाफ़ प्रचार करता है। अपने भक्ति ध्वज को फहराते हुए, वह हमेशा अन्य अवधारणाओं पर विजय पाने के लिए दृढ़ खड़ा रहता है। जब भी किसी भक्त और अभक्त के बीच वाद होता है, तो शुद्ध, दृढ़ भक्त विजयी होता है।

'पाण्ड्य' शब्द 'पंडा' शब्द से आया है, जिसका अर्थ है "ज्ञान।" जब तक कोई अत्यधिक विद्वान नहीं होता, वह गैर-भक्ति अवधारणाओं को जीत नहीं सकता। 'पर' शब्द का अर्थ है "पारलौकिक", और 'पुरा' का अर्थ है "शहर"। परापुर वैकुण्ठ है, जो भगवान का राज्य है, और 'जय' शब्द उस व्यक्ति को संदर्भित करता है जो जीत सकता है। इसका अर्थ यह है कि एक शुद्ध भक्त, जो भक्ति सेवा में दृढ़ है और जिसने सभी गैर-भक्ति अवधारणाओं को जीत लिया है, वह भी भगवान के राज्य को जीत सकता है। दूसरे शब्दों में, कोई भी भक्ति सेवा करके ही भगवान के राज्य वैकुण्ठ को जीत सकता है। भगवान का सर्वोच्च व्यक्तित्व अजित कहलाता है, जिसका अर्थ है कि कोई उसे जीत नहीं सकता, लेकिन एक भक्त, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व के प्रति मजबूत भक्ति सेवा और ईमानदारी से लगाव करके आसानी से उसे जीत सकता है। भगवान कृष्ण सभी के लिए भय के प्रतीक हैं, लेकिन उन्होंने स्वेच्छा से माँ यशोदा की छड़ी से डरने के लिए सहमति व्यक्त की। कृष्ण, भगवान, को उनके भक्त के अलावा कोई नहीं जीत सकता। ऐसा भक्त विदर्भ के राजा की बेटी से दयालुता से विवाह करता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)