श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 27
 
 
श्लोक  4.28.27 
अनन्तपारे तमसि मग्नो नष्टस्मृति: समा: ।
शाश्वतीरनुभूयार्तिं प्रमदासङ्गदूषित: ॥ २७ ॥
 
 
अनुवाद
स्त्री संगति के कारण राजा पुरञ्जन जैसे जीवात्मा को भौतिक संसार के सारे दुख निरंतर सहने पड़ते हैं और बहुत सालों तक सारी स्मृतियों से रहित रहकर भौतिक जीवन के अंधेरे में पड़े रहना पड़ता है।
 
Due to the evil association with women, the living being King Purañjan continuously endures all the sufferings of the world and remains in the dark region of physical life for several years, devoid of all memories.
तात्पर्य
यह भौतिक अस्तित्व का वर्णन है। भौतिक अस्तित्व तब अनुभव किया जाता है जब व्यक्ति किसी स्त्री से आसक्त हो जाता है और कृष्ण के शाश्वत सेवक के रूप में अपनी वास्तविक पहचान भूल जाता है (नष्ट-स्मृतिः)। इस तरह एक शरीर के बाद दूसरे शरीर में जीवात्मा निरंतर भौतिक अस्तित्व के त्रिविध दुखों से पीड़ित होता रहता है। मानव सभ्यता को अज्ञान के अंधकार से बचाने के लिए यह आंदोलन शुरू किया गया था। कृष्ण चेतना आंदोलन का मुख्य उद्देश्य भुलक्कड़ जीवात्मा को ज्ञान देना और उसे उसकी मूल कृष्ण चेतना की याद दिलाना है। इस प्रकार जीवात्मा को अज्ञानता के प्रलय के साथ-साथ शारीरिक स्थानांतरण से भी बचाया जा सकता है। श्रील भक्तिविनोद ठाकुर ने जैसा गाया है:

अनादि करमा-फले, पड़ी' भवारणवा-जले,

तरिबारे ना देखि उपाय

ए विषय-हालाहाळे, दिवा-निशी हिया जवळे,

मना कभु सुख नाही पाया

“अपनी पिछली कामनात्मक गतिविधियों के कारण, मैं अब अज्ञानता के सागर में गिर गया हूं। मैं इस महान सागर से निकलने का कोई साधन नहीं ढूंढ सकता, जो वास्तव में जहर के सागर जैसा है। हम इंद्रिय सुख के माध्यम से खुश रहने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में वह तथाकथित आनंद ऐसे भोजन जैसा है जो बहुत गर्म होता है और हृदय में जलन पैदा करता है। मुझे लगातार, दिन-रात जलन महसूस होती है, और इस तरह मेरा मन संतुष्टि नहीं पा सकता।"

भौतिक अस्तित्व हमेशा चिंता से भरा होता है। लोग हमेशा चिंता को कम करने के कई तरीके खोजने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन क्योंकि उनका मार्गदर्शन वास्तविक नेता द्वारा नहीं किया जाता है, वे शराब और कामुकता में लिप्त होकर भौतिक चिंता को भूलने की कोशिश करते हैं। मूर्ख लोग यह नहीं जानते कि शराब और सेक्स के द्वारा चिंता से बचने का प्रयास करके, वे बस अपने भौतिक जीवन की अवधि बढ़ाते हैं। इस तरह से भौतिक चिंता से बचना संभव नहीं है।

प्रमदा-संग-दूषितः शब्द इंगित करता है कि अन्य सभी प्रकार के दूषणों के अलावा, यदि कोई केवल एक महिला से आसक्त रहता है, तो वह एकल दूषण किसी के दयनीय भौतिक अस्तित्व को लम्बा करने के लिए पर्याप्त होगा। परिणामतः, वैदिक सभ्यता में व्यक्ति को शुरू से ही महिलाओं के प्रति आसक्ति छोड़ने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। जीवन का पहला चरण ब्रह्मचर्य है, दूसरा चरण गृहस्थ, तीसरा चरण वानप्रस्थ और चौथा चरण संन्यास है। इन सभी चरणों को व्यक्ति को महिलाओं के साथ संगति से अलग करने में सक्षम बनाने के लिए तैयार किया गया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)