अनादि करमा-फले, पड़ी' भवारणवा-जले,
तरिबारे ना देखि उपाय
ए विषय-हालाहाळे, दिवा-निशी हिया जवळे,
मना कभु सुख नाही पाया
“अपनी पिछली कामनात्मक गतिविधियों के कारण, मैं अब अज्ञानता के सागर में गिर गया हूं। मैं इस महान सागर से निकलने का कोई साधन नहीं ढूंढ सकता, जो वास्तव में जहर के सागर जैसा है। हम इंद्रिय सुख के माध्यम से खुश रहने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन वास्तव में वह तथाकथित आनंद ऐसे भोजन जैसा है जो बहुत गर्म होता है और हृदय में जलन पैदा करता है। मुझे लगातार, दिन-रात जलन महसूस होती है, और इस तरह मेरा मन संतुष्टि नहीं पा सकता।"
भौतिक अस्तित्व हमेशा चिंता से भरा होता है। लोग हमेशा चिंता को कम करने के कई तरीके खोजने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन क्योंकि उनका मार्गदर्शन वास्तविक नेता द्वारा नहीं किया जाता है, वे शराब और कामुकता में लिप्त होकर भौतिक चिंता को भूलने की कोशिश करते हैं। मूर्ख लोग यह नहीं जानते कि शराब और सेक्स के द्वारा चिंता से बचने का प्रयास करके, वे बस अपने भौतिक जीवन की अवधि बढ़ाते हैं। इस तरह से भौतिक चिंता से बचना संभव नहीं है।
प्रमदा-संग-दूषितः शब्द इंगित करता है कि अन्य सभी प्रकार के दूषणों के अलावा, यदि कोई केवल एक महिला से आसक्त रहता है, तो वह एकल दूषण किसी के दयनीय भौतिक अस्तित्व को लम्बा करने के लिए पर्याप्त होगा। परिणामतः, वैदिक सभ्यता में व्यक्ति को शुरू से ही महिलाओं के प्रति आसक्ति छोड़ने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। जीवन का पहला चरण ब्रह्मचर्य है, दूसरा चरण गृहस्थ, तीसरा चरण वानप्रस्थ और चौथा चरण संन्यास है। इन सभी चरणों को व्यक्ति को महिलाओं के साथ संगति से अलग करने में सक्षम बनाने के लिए तैयार किया गया है।
