तान अहं द्विषतः क्रूरान
संसारेषु नराधमान
क्षिपाम्य अजस्रम शुभान
आसुरीषु एव योनिषु
"जो ईर्ष्यालु और शरारती हैं, जो मनुष्यों में सबसे नीच हैं, मुझे भौतिक अस्तित्व के सागर में, जीवन की विभिन्न राक्षसी प्रजातियों में डाल दिया जाता है। पशु-हत्यारे (हिंसक), अन्य जीवित प्राणियों और परम भगवान से ईर्ष्या करते हुए, अंधकार में डाल दिए जाते हैं और जीवन के विषय और उद्देश्य को नहीं समझ सकते हैं। यह अगले श्लोकों में आगे बताया गया है।
