श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 26
 
 
श्लोक  4.28.26 
तं यज्ञपशवोऽनेन संज्ञप्ता येऽदयालुना ।
कुठारैश्चिच्छिदु: क्रुद्धा: स्मरन्तोऽमीवमस्य तत् ॥ २६ ॥
 
 
अनुवाद
बहुत निर्दयी राजा पुरञ्जन ने कई यज्ञों में अनेक पशुओं का वध किया था। अब वक्त का फायदा उठाकर वे सारे पशु उसे अपने सींगों से घायल करने लगे। ऐसा लग रहा था मानो उसे कुल्हाड़ियों से काट-काटकर टुकड़े-टुकड़े किया जा रहा हो।
 
That ruthless king Puranjan had killed many animals in various yagnas. Now all those animals took advantage of this opportunity and started piercing him with their horns. It seemed as if he was being cut into pieces with axes.
तात्पर्य
जो लोग धर्म और भोजन के नाम पर जानवरों को मारने में बहुत उत्साही होते हैं, उन्हें मृत्यु के बाद ऐसा ही दंड मिलना चाहिए। “मांस” शब्द इंगित करता है कि हम जिन जानवरों को मारते हैं, उन्हें भी हमें मारने का अवसर दिया जाएगा। यद्यपि वास्तव में कोई भी जीव नहीं मारा जाता है, लेकिन जानवरों के सींगों से छेदे जाने के दर्द का अनुभव मृत्यु के बाद किया जाएगा। इसे न जानते हुए, दुष्ट निःसंकोच गरीब जानवरों को मारते रहते हैं। तथाकथित मानव सभ्यता ने धर्म या भोजन के नाम पर जानवरों के लिए कई वधशालाएँ खोल दी हैं। जो लोग थोड़े धार्मिक हैं, वे मंदिरों, मस्जिदों या गिरजाघरों में जानवरों को मारते हैं, और जो अधिक पतित हैं, वे विभिन्न वधशालाओं का रखरखाव करते हैं। जिस तरह सभ्य मानव समाज में कानून एक जीवन के लिए एक जीवन है, सर्वोच्च प्रभु के संबंध में कोई भी जीवित प्राणी किसी अन्य जीवित प्राणी का अतिक्रमण नहीं कर सकता है। सर्वोच्च पिता की कीमत पर सभी को जीने की आजादी दी जानी चाहिए, और पशु-हत्या - चाहे धर्म के लिए या भोजन के लिए - की हमेशा सर्वोच्च भगवान निंदा करते हैं। भगवद-गीता (16.19) में भगवान कृष्ण कहते हैं:

तान अहं द्विषतः क्रूरान

संसारेषु नराधमान

क्षिपाम्य अजस्रम शुभान

आसुरीषु एव योनिषु

"जो ईर्ष्यालु और शरारती हैं, जो मनुष्यों में सबसे नीच हैं, मुझे भौतिक अस्तित्व के सागर में, जीवन की विभिन्न राक्षसी प्रजातियों में डाल दिया जाता है। पशु-हत्यारे (हिंसक), अन्य जीवित प्राणियों और परम भगवान से ईर्ष्या करते हुए, अंधकार में डाल दिए जाते हैं और जीवन के विषय और उद्देश्य को नहीं समझ सकते हैं। यह अगले श्लोकों में आगे बताया गया है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)