श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  4.28.25 
विकृष्यमाण: प्रसभं यवनेन बलीयसा ।
नाविन्दत्तमसाविष्ट: सखायं सुहृदं पुर: ॥ २५ ॥
 
 
अनुवाद
जब राजा पुरंजना को शक्तिशाली यूनानी ने बलपूर्वक घसीटा, तो भी अपनी निरी मूर्खता के कारण वह अपने मित्र और शुभचिंतक, परमात्मा को याद नहीं कर सके।
 
Even when King Purañjana was being forcibly dragged by the powerful Yavana, due to his sheer stupidity he could not remember his friend and well-wisher, the Supreme Being.
तात्पर्य
भगवद् गीता (5.29) में भगवान कृष्ण कहते हैं:

भोक्तारं यज्ञ-तपसां

सर्व-लोक-महेश्वरम्

सुहृदं सर्व-भूतानां

ज्ञात्वा मां शांतिम् ऋच्छति

एक व्यक्ति पूरी तरह से कृष्णभावना में हो सकता है और अगर वह तीन बातें जानता है तो प्रसन्न और संतुष्ट हो सकता है - अर्थात्, सर्वोच्च भगवान कृष्ण सभी लाभों के उपभोक्ता हैं, कि वह हर चीज के मालिक हैं, और वह सभी जीवों का सर्वोच्च मित्र है। अगर कोई यह नहीं जानता और इसके बजाय शारीरिक अवधारणा के तहत कार्य करता है, तो उसे हमेशा भौतिक प्रकृति द्वारा प्रस्तुत क्लेशों द्वारा परेशान किया जाता है। वास्तविक रूप से, सर्वोच्च भगवान सभी के साथ बैठे हैं: ईश्वरः सर्व-भूतानां हृद - देसे अर्जुन तिष्ठति (भगवद् गीता 18.61)। जीवित व्यक्ति और परमात्मा एक ही पेड़ में साथ-साथ बैठे हैं, लेकिन भौतिक प्रकृति के नियमों द्वारा परेशान होने के बावजूद भी, मूर्ख जीवित इकाई सुरक्षा के लिए सर्वोच्च भगवान की ओर नहीं मुड़ता है। हालाँकि, वह सोचता है कि वह भौतिक प्रकृति के सख्त कानूनों से खुद को बचाने में सक्षम है। हालाँकि, यह संभव नहीं है। जीवित इकाई को सर्वोच्च भगवान की ओर मुड़ना चाहिए और उसके सामने आत्मसमर्पण करना चाहिए। तभी उसे शक्तिशाली यवन या यमराज के हमले से बचाया जाएगा।

इस श्लोक में शब्द "सखायाम", "मित्र" बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि भगवान जीवों के बगल में हमेशा मौजूद है। सर्वोच्च भगवान को "सुहृद", "हमेशा शुभचिंतक" के रूप में भी वर्णित किया गया है। सर्वोच्च भगवान हमेशा एक शुभचिंतक होता है, बिल्कुल एक पिता या माँ की तरह। एक बेटे के सभी अपराधों के बावजूद, पिता और माँ, हमेशा बेटे के शुभचिंतक होते हैं। इसी तरह, हमारे सभी अपराधों और सर्वोच्च भगवान की इच्छाओं की अवहेलना के बावजूद, भगवान हमें भौतिक प्रकृति द्वारा दी गई सभी कठिनाइयों से तत्काल राहत देंगे यदि हम बस उनके सामने आत्मसमर्पण करते हैं, जैसा कि भगवद् गीता में पुष्टि की गई है (माम एव ये प्रपद्यन्ते माया एतां तरन्ति ते)। दुर्भाग्य से, हमारे बुरे संगति और इंद्रिय तृप्ति के लिए महान लगाव के कारण, हम अपने सबसे अच्छे दोस्त, सर्वोच्च भगवान को याद नहीं रखते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)