यस्यत्म-बुद्धिः कुणपे त्रि-धातुके
स्व-धीः कलत्रादिषु भौम इज्या-धीः
यत्-तीर्थ-बुद्धिशालिले न करिचिज
जनेष्व अभिज्ञेषु स एव गो-खरः
"एक इंसान जो इस शरीर को तीन तत्वों से बना मानता है, जो शरीर के उपोत्पादों को अपने परिजनों के रूप में मानता है, जो जन्मभूमि को पूजनीय मानता है, और जो तीर्थ स्थान केवल स्नान करने के बजाय वहाँ के पारलौकिक ज्ञान वाले लोगों से मिलने जाता है, उसे एक गधा या गाय की तरह माना जाना चाहिए।" (भागवतम् 10.84.13)
कृष्ण-चेतना से रहित मानव सभ्यता केवल निम्न जानवरों की सभ्यता है। कभी-कभी ऐसी सभ्यता मृत शरीर का अध्ययन कर सकती है और मस्तिष्क या हृदय पर विचार कर सकती है। हालाँकि, शरीर का कोई भी हिस्सा महत्वपूर्ण नहीं है जब तक कि आत्मा मौजूद न हो। गायों और गधों की एक आधुनिक सभ्यता में, वैज्ञानिक किसी मृत व्यक्ति के मस्तिष्क या हृदय में कुछ मूल्य खोजने का प्रयास करते हैं।
