श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 24
 
 
श्लोक  4.28.24 
पुरीं विहायोपगत उपरुद्धो भुजङ्गम: ।
यदा तमेवानु पुरी विशीर्णा प्रकृतिं गता ॥ २४ ॥
 
 
अनुवाद
वह सर्प, जिसे यवन-राजा के सैनिकों ने पहले ही बंदी बनाकर नगरी से बाहर कर दिया था, अन्य लोगों के साथ अपने स्वामी के पीछे-पीछे चलने लगा। जैसे ही वे सभी नगरी से बाहर निकले, त्योंही वह नगरी तहस-नहस होकर धूल में मिल गई।
 
The serpent, who had already been captured and thrown out of the city by the soldiers of the Yavana king, also followed his master along with the others. As soon as all of them left the city, the city was devastated and turned into dust.
तात्पर्य
जब जीव को पकड़ लिया जाता है, तो उसके सभी अनुयायी- अर्थात प्राणवायु, इंद्रियाँ और इंद्रिय-विषय- तुरंत ही पदार्थ के ढेर अर्थात शरीर को छोड़ देते हैं। जब जीव और उसके साथी चले जाते हैं, तो शरीर अब काम नहीं करता है बल्कि मूलभूत भौतिक तत्वों- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश- में बदल जाता है। जब शत्रुओं द्वारा आक्रमण किए गए शहर को उसके निवासियों द्वारा खाली कर दिया जाता है, तो शत्रु तुरंत उस शहर का लाभ उठाते हैं और उसे बमबारी करके पूरे शहर को धूल में मिला देते हैं। जब हम कहते हैं, "तुम धूल हो, और तुम धूल में मिल जाओगे," तो हमारा तात्पर्य शरीर से है। जब किसी शहर पर शत्रुओं द्वारा हमला किया जाता है और उसकी बमबारी की जाती है, तो आम तौर पर नागरिक शहर छोड़ देते हैं, और शहर अस्तित्व में नहीं रहता है। वह मूर्ख है जो नागरिकों या निवासियों की परवाह किए बिना किसी शहर की स्थिति में सुधार करने में लगा रहता है। इसी तरह, एक जीव जो आध्यात्मिक ज्ञान में ठीक से प्रबुद्ध नहीं है, वह केवल बाहरी शरीर की देखभाल करता है, यह नहीं जानता कि आत्मा शरीर के भीतर का प्रमुख कारक है। जब कोई आध्यात्मिक ज्ञान में उन्नत होता है, तो आत्मा को अनंत काल तक शरीर परिवर्तन से बचाया जाता है। भागवतम् उन लोगों को जो अपने शरीर से जुड़े हुए हैं, गायों और गधों (स एव गो-खरः) की तरह मानता है। गाय एक बहुत ही मासूम जानवर है, और गधा बोझ का जानवर है। जो व्यक्ति देह-धारणा के अधीन काम करता है, वह बस एक गधे की तरह काम करता है और अपने स्वार्थ को नहीं जानता। इसलिए कहा गया है:

यस्यत्म-बुद्धिः कुणपे त्रि-धातुके

स्व-धीः कलत्रादिषु भौम इज्या-धीः

यत्-तीर्थ-बुद्धिशालिले न करिचिज

जनेष्व अभिज्ञेषु स एव गो-खरः

"एक इंसान जो इस शरीर को तीन तत्वों से बना मानता है, जो शरीर के उपोत्पादों को अपने परिजनों के रूप में मानता है, जो जन्मभूमि को पूजनीय मानता है, और जो तीर्थ स्थान केवल स्नान करने के बजाय वहाँ के पारलौकिक ज्ञान वाले लोगों से मिलने जाता है, उसे एक गधा या गाय की तरह माना जाना चाहिए।" (भागवतम् 10.84.13)

कृष्ण-चेतना से रहित मानव सभ्यता केवल निम्न जानवरों की सभ्यता है। कभी-कभी ऐसी सभ्यता मृत शरीर का अध्ययन कर सकती है और मस्तिष्क या हृदय पर विचार कर सकती है। हालाँकि, शरीर का कोई भी हिस्सा महत्वपूर्ण नहीं है जब तक कि आत्मा मौजूद न हो। गायों और गधों की एक आधुनिक सभ्यता में, वैज्ञानिक किसी मृत व्यक्ति के मस्तिष्क या हृदय में कुछ मूल्य खोजने का प्रयास करते हैं।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)