श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  4.28.23 
पशुवद्यवनैरेष नीयमान: स्वकं क्षयम् ।
अन्वद्रवन्ननुपथा: शोचन्तो भृशमातुरा: ॥ २३ ॥
 
 
अनुवाद
जब यवन लोग राजा पुरञ्जन को पशु के समान बाँधकर उनके स्थान ले जाने लगे तो राजा के अनुयायी अत्यंत शोकाकुल हो गए। विलाप करते हुए उन्हें भी राजा के साथ जाना पड़ा।
 
When the Yavanas tied up King Puranjan like an animal and started taking him to their place, the king's followers became very sad. They too had to go along with the king while mourning.
तात्पर्य
जब यमराज और उनके सहायक किसी जीवित प्राणी को न्याय स्थान की ओर ले जाते हैं, तो प्राण, इच्छाएँ और हवा, जो कि उस प्राणी की अनुयायी होती हैं, भी उसके साथ जाती हैं। वेदों में इसकी पुष्टि की गई है। जब किसी जीव को यमराज द्वारा ले जाया या गिरफ्तार किया जाता है (तम उत्क्रमंतम), तो प्राणवायु उसके साथ जाती है (प्राणोऽनूतक्रमति), और जब प्राणवायु चली जाती है (प्राणम अनूतक्रमंतम), तो सभी इंद्रियाँ (सर्व प्रणाः) भी साथ जाती हैं (अनूतक्रमंति)। जब वह प्राणी और प्राणवायु चली जाती है, तो पाँच तत्वों - पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश - से निर्मित पदार्थ को त्याग दिया जाता है और उसे पीछे छोड़ दिया जाता है। फिर वह प्राणी न्यायालय जाता है, और यमराज तय करता है कि उसे अगले जन्म में किस प्रकार का शरीर मिलेगा। यह प्रक्रिया आधुनिक वैज्ञानिकों को पता नहीं है। प्रत्येक जीवित प्राणी अपने इस जीवन के कार्यों के लिए जिम्मेदार होता है, और मृत्यु के बाद उसे यमराज के दरबार में ले जाया जाता है, जहाँ यह तय किया जाता है कि उसे अगला जन्म किस प्रकार का शरीर मिलेगा। यद्यपि स्थूल भौतिक शरीर छोड़ दिया जाता है, जीवित प्राणी और उसकी इच्छाएँ, साथ ही उसकी पिछली गतिविधियों की परिणामी प्रतिक्रियाएँ चलती रहती हैं। यह यमराज है जो तय करता है कि किसी को उसके पिछले कार्यों के अनुसार अगला जन्म किस प्रकार का शरीर मिलेगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)