श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  4.28.22 
एवं कृपणया बुद्ध्या शोचन्तमतदर्हणम् ।
ग्रहीतुं कृतधीरेनं भयनामाभ्यपद्यत ॥ २२ ॥
 
 
अनुवाद
यद्यपि राजा पुरञ्जन को अपनी पत्नी एवं बच्चों की नियति पर खेद नहीं जताना चाहिए था, परन्तु उनकी निम्न बुद्धि के कारण उन्होंने ऐसा किया। उसी समय, भय नाम के यवनराजा शीघ्र ही उन्हें बंदी बनाने के लिए सामने आये।
 
Although King Purañjana should not have regretted the fate of his wife and children, he did so because of his poor wisdom. At that moment, the Yavana king named Bhaya rushed near to arrest him.
तात्पर्य
मूर्ख व्यक्ति यह नहीं जानते कि प्रत्येक जीवात्मा अपने जीवन में अपने कार्यों और प्रतिक्रियाओं के लिए स्वयं उत्तरदायी होती है। जब तक एक जीवित इकाई बालक या लड़के के रूप में मासूम होती है, तब तक यह माता-पिता का कर्तव्य होता है कि वे उसे जीवन के मूल्यों को सही ढंग से समझाएँ। जब एक बच्चा बड़ा हो जाता है, तो इसे जीवन के कर्तव्यों को सही ढंग से निष्पादित करने के लिए उस पर छोड़ देना चाहिए। माता-पिता, उनकी मृत्यु के बाद, अपने बच्चे की मदद नहीं कर सकते। एक पिता अपने बच्चों की तत्काल सहायता के लिए कुछ सम्पत्ति छोड़ सकता है, लेकिन उन्हें इस विचार में अत्यधिक मग्न नहीं रहना चाहिए कि उनकी मृत्यु के बाद उनका परिवार कैसे जीवित रहेगा। यह सशर्त आत्मा की बीमारी है। वह न केवल अपनी इंद्रिय सुख के लिए पापपूर्ण गतिविधियाँ करता है, बल्कि वह बहुत धन भी जमा करता है ताकि वह अपने बच्चों के लिए भी इंद्रिय सुख की व्यवस्था कर सके। किसी भी मामले में, हर कोई मृत्यु से डरता है, और इसलिए मृत्यु को भय कहा जाता है। हालाँकि राजा पुरंजना अपनी पत्नी और बच्चों को याद करने में लगे हुए थे, लेकिन मृत्यु ने उनकी प्रतीक्षा नहीं की। मृत्यु किसी भी मनुष्य की प्रतीक्षा नहीं करती; यह तुरंत अपना कर्तव्य पूरा कर लेगी। चूँकि मृत्यु को बिना किसी हिचकिचाहट के जीवित इकाई को छीन लेना चाहिए, इसलिए यह नास्तिकों का परम ईश्वर बोध है, जो ईश्वर चेतना की उपेक्षा के लिए देश, समाज और रिश्तेदारों के बारे में सोचकर अपने जीवन को खराब कर लेते हैं। इस श्लोक में शब्द 'अतद-अर्हणम' बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसका अर्थ है कि किसी को अपने परिवार के सदस्यों, देशवासियों, समाज और समुदाय के लिए कल्याणकारी गतिविधियों में अत्यधिक संलग्न नहीं होना चाहिए। इनमें से कुछ भी किसी व्यक्ति को आध्यात्मिक रूप से आगे बढ़ने में मदद नहीं करेगा। दुर्भाग्य से, वर्तमान समय के समाज में तथाकथित शिक्षित लोगों को इस बात का कोई अंदाजा नहीं है कि आध्यात्मिक प्रगति क्या होती है। यद्यपि उनके पास आध्यात्मिक प्रगति करने के लिए मानव रूप में जीवन का अवसर है, फिर भी वे कंजूस बने रहते हैं। वे अपने जीवन का दुरुपयोग करते हैं और केवल अपने रिश्तेदारों, देशवासियों, समाज आदि के भौतिक कल्याण के बारे में सोचकर उनका दुरुपयोग करते हैं। किसी का वास्तविक कर्तव्य है कि वह मृत्यु पर विजय प्राप्त करना सीखें। भगवान कृष्ण ने भगवद-गीता (4.9) में मृत्यु पर विजय प्राप्त करने की प्रक्रिया बताई है: "जो मेरे प्रकट होने और गतिविधियों की पारलौकिक प्रकृति को जानता है, वह शरीर छोड़ने पर इस भौतिक दुनिया में फिर से अपना जन्म नहीं लेता, लेकिन मेरे सनातन निवास को प्राप्त करता है, हे अर्जुन।" इस शरीर को त्यागने के बाद, जो व्यक्ति पूर्ण रूप से कृष्ण-भावना से युक्त होता है, वह एक और भौतिक शरीर को स्वीकार नहीं करता, बल्कि घर, भगवान के पास वापस लौट आता है। प्रत्येक व्यक्ति को इस पूर्णता को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। दुर्भाग्य से, ऐसा करने के बजाय, लोग समाज, मित्रता, प्रेम और रिश्तेदारों के विचारों में लिप्त रहते हैं। हालाँकि, यह कृष्ण भावना आंदोलन दुनिया भर के लोगों को शिक्षित कर रहा है और उन्हें बता रहा है कि मृत्यु पर कैसे विजय प्राप्त की जाए। हरिम् विना न मृतिम् तरण्ति: परम भगवान के व्यक्तित्व का आश्रय लिए बिना मृत्यु पर विजय प्राप्त नहीं की जा सकती।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)