मामेवांशो जीवा लोके
जीवा भूत सनातन पुरूषानः
मनःषष्टानीन्द्रियाणि
प्रकृतीस्थानि कर्षति
"इस भौतिक संसार में स्थित जीव मेरे सनातन खंड हैं। इस स्थिति के कारण वे मन सहित छहों इंद्रियों से बड़ी मेहनत से जूझ रहे हैं।"
आखिरकार जीवात्मा परमात्मा कृष्ण का ही अंश है। दूसरे शब्दों में कृष्ण की मूलभूत स्थिति और जीवात्मा की मूलभूत स्थिति गुणात्मक रूप से एक ही है। एकमात्र अंतर यह है कि जीव सनातन रूप से परमात्मा का एक अणु है (मामेवांशो जीवलोके जीव भूत सनातन पुरूषानः)। इस सशर्त भौतिक जीवन में, जीवात्मा अर्थात परम प्रभु का खंड अंश, अपने दूषित चित्त और चेतना के कारण संघर्ष कर रहा है। जीवात्मा को परम प्रभु का अंश होने के कारण कृष्ण का ध्यान करना चाहिए, किंतु यहाँ हम देखते हैं कि राजा पुरंजना (जीवात्मा) एक स्त्री के बारे में सोच रहे हैं। किसी इंद्रिय-विषय में इस तरह की मानसिक आसक्ति, जीवात्मा के लिए इस भौतिक संसार में अस्तित्व का संघर्ष लाती है। चूंकि राजा पुरंजना अपनी पत्नी के बारे में सोच रहे हैं, अतः भौतिक संसार में उनका अस्तित्व का संघर्ष मृत्यु से समाप्त नहीं होगा। जैसा कि निम्नलिखित श्लोकों में बताया गया है, अपनी पत्नी के विचारों में अत्यधिक लीन होने के कारण, राजा पुरंजना को अपने अगले जन्म में एक महिला का शरीर धारण करना पड़ा। इस प्रकार सामाजिक, राजनीतिक, छद्म-धार्मिक, राष्ट्रीय और सांप्रदायिक चेतना में मानसिक मनोधारण ही बंधन का कारण है। इस जीवन काल में मुक्ति प्राप्ति हेतु मनुष्य को अपने कार्यों को बदलना ही पड़ता है। भगवद गीता (3.9) में इसकी पुष्टि की है:
यज्ञार्त कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्म बंधनः।
यदि हम इस जीवन में अपनी चेतना को नहीं बदलते हैं, तो सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक या सांप्रदायिक और राष्ट्रीय कल्याण के नाम पर हम जो भी करेंगे, वह हमारे बंधन का कारण बनेगा। इसका मतलब यह है कि हमें भौतिक, सशर्त जीवन में बने रहना होगा। जैसा कि भगवद गीता (15.7) में बताया गया है, मनःषष्टानीन्द्रियाणि प्रकृतीस्थानि कर्षति: जब मन और इंद्रियाँ भौतिक गतिविधियों में लिप्त होती हैं, तो व्यक्ति को अपने भौतिक अस्तित्व को जारी रखना होता है और सुख प्राप्ति के लिए संघर्ष करना पड़ता है। हर एक जीवन में व्यक्ति सुखी होने के संघर्ष में लगा रहता है। वास्तव में इस भौतिक संसार में कोई भी व्यक्ति सुखी नहीं है, लेकिन संघर्ष एक झूठी सुखानुभूति देता है। एक व्यक्ति को बहुत मेहनत करनी पड़ती है और जब वह अपनी मेहनत का फल प्राप्त कर लेता है, तो वह खुद को सुखी मानता है। भौतिक संसार में लोग यह नहीं जानते कि वास्तविक सुख क्या है। सुखमात्यंतिकं यद्बुद्धिग्राह्यमतिंद्रियं (भगवद गीता 6.21): वास्तविक सुख का आनंद व्यक्ति की आध्यात्मिक इंद्रियों से ही लिया जा सकता है। जब तक व्यक्ति शुद्ध नहीं होता है, तब तक आध्यात्मिक इंद्रियाँ प्रकट नहीं होती हैं; इसलिए इंद्रियों को शुद्ध करने के लिए व्यक्ति को कृष्ण चेतना को अपनाना चाहिए और इंद्रियों को प्रभु की सेवा में लगाना चाहिए। तभी वास्तविक सुख और मुक्ति मिलेगी।
भगवद गीता में कहा गया है (15.8):
शरीरं यदवाप्नोति
यच्चा प्युतक्रामीश्वरः
ग्रहीत्वैतानि संयाति
वायुर गंधान इवाशयात्
"भौतिक संसार में जीव भिन्न-भिन्न जीवन संबंधी अवधारणाओं को एक शरीर से दूसरे शरीर में ले जाता है जैसे वायु सुगंधों को ले जाती है।" यदि हवा गुलाब के बगीचे से होकर जाती है, तो वह गुलाबों की सुगंध को साथ ले जाएगी, और अगर वह किसी गंदी जगह से गुजरती है, तो वह घृणित चीजों की बदबू को साथ ले जाएगी। इसी तरह जीवात्मा, राजा पुरंजना, अब अपने जीवन की हवा को अपनी पत्नी, एक स्त्री पर ले जा रहे हैं; इसलिए उन्हें अपने अगले जन्म में एक महिला का शरीर धारण करना होगा।
