श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  4.28.2 
त एकदा तु रभसा पुरञ्जनपुरीं नृप ।
रुरुधुर्भौमभोगाढ्यां जरत्पन्नगपालिताम् ॥ २ ॥
 
 
अनुवाद
एक बार, वहशी सैनिकों ने पुरञ्जन नगरी पर तीव्र गति से हमला किया। यद्यपि नगरी भोग-विलास की सामग्री से भरी हुई थी, परन्तु उसकी रक्षा एक बूढ़ा सर्प कर रहा था।
 
Once these fearsome soldiers attacked the city of Puranjan with great force. Although this city was full of all the material things for enjoyment, but it was being guarded by an old snake.
तात्पर्य
जैसे ही किसी का शरीर इंद्रियों के सुखों में लिप्त होता जाता है, यह दिनों-दिन कमजोर और कमजोर होता जाता है। अंत में प्राण शक्ति इतनी कमजोर हो जाती है कि इसकी तुलना यहाँ एक कमजोर सर्प से की जाती है। प्राण वायु की तुलना पहले ही सर्प से की जा चुकी है। जब शरीर के भीतर की प्राण शक्ति कमजोर हो जाती है, तो शरीर भी कमजोर हो जाता है। ऐसे समय में मृत्यु के लक्षण - यानी, यमराज के मृत्यु अधीक्षक के खतरनाक सैनिक - बहुत ही गंभीर रूप से हमला करना शुरू कर देते हैं। वैदिक प्रणाली के अनुसार, ऐसे चरण में आने से पहले व्यक्ति को घर छोड़ देना चाहिए और जीवन भर ईश्वर के संदेश का प्रचार करने के लिए संन्यास लेना चाहिए। हालाँकि, यदि कोई व्यक्ति घर पर बैठकर अपनी प्यारी पत्नी और बच्चों की सेवा करता है, तो वह निश्चित रूप से इंद्रिय सुखों के कारण कमजोर और कमजोर होता जाता है। जब अंततः मृत्यु आती है, तो व्यक्ति आध्यात्मिक संपत्ति से रहित शरीर को छोड़ देता है। वर्तमान समय में, परिवार का सबसे बुजुर्ग व्यक्ति भी पत्नी, बच्चों, धन, वैभव, घर आदि के प्रति आकर्षित होकर घर नहीं छोड़ता। इस प्रकार जीवन के अंत में व्यक्ति को इस बात की चिंता सताने लगती है कि उसकी पत्नी की रक्षा कैसे होगी और वह परिवार की बड़ी जिम्मेदारियों को कैसे संभाल पाएगी। इस तरह आमतौर पर एक व्यक्ति मृत्यु से पहले अपनी पत्नी के बारे में सोचता है। भगवद-गीता (8.6) के अनुसार:

यां यां वापि स्मरन भावं

त्यजत्यंते कलेवरम

तं तमेवैति कौंतेय

सदा तद्-भाव-भावितः

"जो भी अवस्था कोई मरते समय स्मरण करता है, वह अवस्था निश्चित रूप से प्राप्त करता है।"

जीवन के अंत में, व्यक्ति सोचता है कि उसने अपने पूरे जीवन में क्या किया है; इस प्रकार वह जीवन के अंत में अपने विचारों और इच्छाओं के अनुसार एक और शरीर (देहान्तर) प्राप्त करता है। घर में जीवन के प्रति अत्यधिक आसक्त व्यक्ति स्वाभाविक रूप से जीवन के अंत में अपनी प्यारी पत्नी के बारे में सोचता है। परिणामस्वरूप, अगले जन्म में उसे एक स्त्री का शरीर प्राप्त होता है और वह अपने पवित्र या अधर्मी कर्मों का फल भी प्राप्त करता है। इस अध्याय में राजा पुरंजना द्वारा एक नारी के शरीर को ग्रहण करने की विस्तार से व्याख्या की जाएगी।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)