यां यां वापि स्मरन भावं
त्यजत्यंते कलेवरम
तं तमेवैति कौंतेय
सदा तद्-भाव-भावितः
"जो भी अवस्था कोई मरते समय स्मरण करता है, वह अवस्था निश्चित रूप से प्राप्त करता है।"
जीवन के अंत में, व्यक्ति सोचता है कि उसने अपने पूरे जीवन में क्या किया है; इस प्रकार वह जीवन के अंत में अपने विचारों और इच्छाओं के अनुसार एक और शरीर (देहान्तर) प्राप्त करता है। घर में जीवन के प्रति अत्यधिक आसक्त व्यक्ति स्वाभाविक रूप से जीवन के अंत में अपनी प्यारी पत्नी के बारे में सोचता है। परिणामस्वरूप, अगले जन्म में उसे एक स्त्री का शरीर प्राप्त होता है और वह अपने पवित्र या अधर्मी कर्मों का फल भी प्राप्त करता है। इस अध्याय में राजा पुरंजना द्वारा एक नारी के शरीर को ग्रहण करने की विस्तार से व्याख्या की जाएगी।
