श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  4.28.19 
न मय्यनाशिते भुङ्क्ते नास्‍नाते स्‍नाति मत्परा ।
मयि रुष्टे सुसन्त्रस्ता भर्त्सिते यतवाग्भयात् ॥ १९ ॥
 
 
अनुवाद
राजा पुरञ्जन अपनी पत्नी के साथ किए गए अपने पुराने व्यवहारों को याद कर रहे थे। उन्हें याद आया कि उनकी पत्नी तब तक भोजन नहीं करती थी जब तक वह स्वयं नहीं खा लेते थे, वह तब तक नहीं नहाती थी जब तक वह नहीं नहा लेते थे और वह हमेशा उनसे बहुत अधिक प्यार करती थी। अगर वह कभी गुस्सा हो जाते थे और उन्हें डांटते थे, तो वह चुपचाप उनके बुरे व्यवहार को सह लेती थीं।
 
King Puranjana thought of his past dealings with his wife. He remembered that his wife did not eat until he had finished eating; she did not bathe until he had finished, and she was always so fond of him that if he ever rebuked her and became angry with her, she would silently endure his misbehavior.
तात्पर्य
स्त्री को हमेशा अपने पति के अधीन माना जाता है। आज्ञाकारिता, सौम्य व्यवहार और अधीनता एक स्त्री के गुण है जो पति को उसके बारे में बहुत विचारशील बनाता है। पारिवारिक जीवन के लिए पति के लिए अपनी पत्नी से जुड़ना बहुत अच्छा है, लेकिन आध्यात्मिक उन्नति के लिए यह बहुत अच्छा नहीं है। इस प्रकार प्रत्येक घर में कृष्ण भावना की स्थापना आवश्यक है। यदि एक पति और पत्नी कृष्ण भावना में एक-दूसरे से बहुत अधिक जुड़े हुए हैं, तो वे दोनों लाभान्वित होंगे क्योंकि कृष्ण उनके अस्तित्व का केंद्र हैं। अन्यथा, यदि पति अपनी पत्नी से बहुत अधिक जुड़ा हुआ है, तो वह अपने अगले जीवन में एक महिला बन जाता है। स्त्री अपने पति से अत्यधिक आसक्त होने के कारण अपने अगले जन्म में पुरुष बन जाती है। बेशक, एक महिला के लिए पुरुष बनना एक फायदा है, लेकिन एक पुरुष के लिए महिला बनना बिल्कुल भी फायदेमंद नहीं है।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)