श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 28: अगले जन्म में पुरञ्जन को स्त्री-योनि की प्राप्ति  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  4.28.18 
लोकान्तरं गतवति मय्यनाथा कुटुम्बिनी ।
वर्तिष्यते कथं त्वेषा बालकाननुशोचती ॥ १८ ॥
 
 
अनुवाद
राजा पुरञ्जन अत्यन्त चिन्तित होकर विचार करने लगा, “हाय! मेरी पत्नी इतने सारे बच्चों से परेशान होकर रहेगी। जब मैं यह शरीर त्याग दूँगा तो वह किस प्रकार परिवार के इन सभी सदस्यों का पालन-पोषण करेगी? हाय! परिवार का पालन-पोषण करने के विचार से उसे अत्यधिक कष्ट होगा।”
 
King Purañjana became very worried and thought, “Alas! My wife will be troubled with so many children. When I leave this body, how will she support all these family members? Alas! She will be very distressed at the thought of supporting the family.”
तात्पर्य
इस प्रकार अपनी पत्नी के बारे में सोचना यह दर्शाता है कि राजा बहुत अधिक स्त्री विचारों में लगा रहता था। सामान्यतः पतिव्रता एक बहुत ही आज्ञाकारी पत्नी होती है। इस कारण पति अपनी पत्नी के प्रति अत्यधिक आ आसक्त हो जाता है और मृत्यु के समय वह अपनी पत्नी के बारे में बहुत अधिक सोचता है। राजा पुरंजना का जीवन इसका एक बहुत ही खतरनाक उदाहरण है। यदि कोई व्यक्ति मृत्यु के समय कृष्ण के बजाय अपनी पत्नी को याद करता है, तो वह निश्चित रूप से अपने घर, भगवद्धाम को प्राप्त नहीं होगा, बल्कि उसे एक स्त्री का शरीर स्वीकार करना पड़ेगा और इस प्रकार भौतिक जीवन का एक नया अध्याय प्रारंभ होगा।
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)