श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 27: राजा पुरञ्जन की नगरी पर चण्डवेग का धावा और कालकन्या का चरित्र  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  4.27.9 
पुत्राणां चाभवन्पुत्रा एकैकस्य शतं शतम् ।
यैर्वै पौरञ्जनो वंश: पञ्चालेषु समेधित: ॥ ९ ॥
 
 
अनुवाद
इन अनेक पुत्रों में से प्रत्येक के सैंकड़ों-सैंकड़ों पौत्र हुए। इस प्रकार राजा पुरञ्जन के पुत्रों और पौत्रों से पूरा पंचाल देश भर गया।
 
Each of these many sons produced hundreds of sons. Thus the entire Panchala country was filled with the sons and grandsons of King Puranjan.
तात्पर्य
हमें यह याद रखना चाहिए कि पुरंजना जीव है, और पाँचाल देह है। शरीर जीव के कार्य करने का स्थान है, जैसा कि भगवद् गीता में बताया गया है: क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ। दो अवयव हैं: जीव (क्षेत्रज्ञ) और दूसरा जीव का शरीर (क्षेत्र)। कोई भी जीव यह जान सकता है कि वह शरीर से आवृत है यदि वह शरीर के बारे में थोड़ा सा विचार करता है। थोड़े से विचारों से ही वह समझ सकता है कि शरीर उसकी सम्पत्ति है। व्यक्ति इसे व्यावहारिक अनुभव और शास्त्रों के अधिकार से समझ सकता है। भगवद् गीता (2.13) में कहा गया है, देहिनोऽस्मिन् यथा देहे: शरीर का स्वामी, आत्मा, शरीर के भीतर है। शरीर को पंचाल देश या गतिविधियों के क्षेत्र के रूप में लिया जाता है जिसमें जीव गंध, रस, रूप, स्पर्श और शब्द नामक पाँच इंद्रिय विषयों के सम्बंध में इंद्रियों का आनंद लेता है - अर्थात, पृथ्वी, जल, अग्नि , वायु और आकाश से बने इंद्रिय विषय। इस भौतिक संसार के भीतर, स्थूल और सूक्ष्म पदार्थ से बने भौतिक शरीर से घिरे हुए, हर जीव क्रियाएँ और प्रतिक्रियाएँ करता है, जिन्हें यहाँ पुत्रों और पौत्रों के रूप में जाना जाता है। दो प्रकार की क्रियाएँ और प्रतिक्रियाएँ होती हैं - धार्मिक और पापपूर्ण। इस तरह, हमारा भौतिक अस्तित्व विभिन्न क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं से आच्छादित हो जाता है। इस संबंध में, श्रील नरोत्तम दास ठाकुर कहते हैं:

कर्म-कांड, ज्ञान-कांड, केवल विषेर भांड,

अमृत बलिए येबा खाय

नाना योनि सदा फिरे, कदर्य भक्षण करे,

तार जन्म अधः-पाते याय

"काम सम्बंधित गतिविधियाँ और मानसिक अटकलें केवल जहर के प्याले हैं। जो कोई भी उन्हें पीता है, उन्हें अमृत मानकर, उन्हें जीवन के बाद बहुत संघर्ष करना चाहिए, विभिन्न प्रकार के शरीरों में। ऐसा व्यक्ति हर तरह की बकवास खाता है और अपनी तथाकथित इंद्रिय भोग गतिविधियों द्वारा निंदनीय हो जाता है।"

इस प्रकार, क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं का क्षेत्र, जिसके द्वारा किसी के वंशजों में वृद्धि होती है, यौन जीवन से शुरू होता है। पुरंजना ने पुत्रों को जन्म देकर अपने पूरे परिवार को बढ़ाया जो बदले में पौत्रों को जन्म देते हैं। इस प्रकार, जीव, यौन संतुष्टि की ओर झुका हुआ, सैकड़ों और हजारों क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं में शामिल हो जाता है। इस प्रकार, वह केवल इंद्रिय तृप्ति के उद्देश्य से भौतिक दुनिया में बना रहता है और एक शरीर से दूसरे शरीर में परिवर्तित होता रहता है। इतने सारे पुत्रों और पौत्रों को पुन: उत्पन्न करने की उसकी प्रक्रिया समाज, राष्ट्र, समुदाय आदि मार्फ़त परिणामित होती है। ये सभी समुदाय, समाज, राजवंश और राष्ट्र केवल यौन जीवन से विस्तारित होते हैं। जैसा कि प्रहलाद महाराज ने कहा है, यं मैथुनादि-गृहमेधी-सुखं हि तुच्छम्‌ (भाग. 7.9.45)। गृहमेधी वह है जो इस भौतिक अस्तित्व के भीतर रहना चाहता है। इसका मतलब है कि वह इस शरीर या समाज के भीतर रहना चाहता है और दोस्ती, प्यार और समुदाय का आनंद लेता है। उसका एकमात्र आनंद यौन सुख भोगने वालों की संख्या में वृद्धि करना है। वह यौन सुख लेता है और बच्चे पैदा करता है, जो बदले में शादी करते हैं और पौत्र पैदा करते हैं। पौत्र भी शादी करते हैं और बदले में परपौत्र पैदा करते हैं। इस तरह, पूरी पृथ्वी अधिक जनसंख्या वाली हो जाती है, और फिर अचानक प्रकृति में युद्ध, अकाल, महामारी, भूकंप आदि के रूप में भौतिक प्रतिक्रियाएँ होती हैं। इस प्रकार, पूरी जनसंख्या फिर से नष्ट हो जाती है और फिर से बनाई जाती है। इस प्रक्रिया को भगवद् गीता (8.19) में बार-बार निर्माण और विनाश के रूप में समझाया गया है: भूतवा भूतवा प्रलीयते। कृष्ण चेतना की कमी के कारण, मानव सभ्यता के नाम पर यह सारा निर्माण और विनाश चल रहा है। यह चक्र मनुष्य द्वारा आत्मा और भगवान के परम व्यक्तित्व के ज्ञान की कमी के कारण जारी रहता है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)