कर्म-कांड, ज्ञान-कांड, केवल विषेर भांड,
अमृत बलिए येबा खाय
नाना योनि सदा फिरे, कदर्य भक्षण करे,
तार जन्म अधः-पाते याय
"काम सम्बंधित गतिविधियाँ और मानसिक अटकलें केवल जहर के प्याले हैं। जो कोई भी उन्हें पीता है, उन्हें अमृत मानकर, उन्हें जीवन के बाद बहुत संघर्ष करना चाहिए, विभिन्न प्रकार के शरीरों में। ऐसा व्यक्ति हर तरह की बकवास खाता है और अपनी तथाकथित इंद्रिय भोग गतिविधियों द्वारा निंदनीय हो जाता है।"
इस प्रकार, क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं का क्षेत्र, जिसके द्वारा किसी के वंशजों में वृद्धि होती है, यौन जीवन से शुरू होता है। पुरंजना ने पुत्रों को जन्म देकर अपने पूरे परिवार को बढ़ाया जो बदले में पौत्रों को जन्म देते हैं। इस प्रकार, जीव, यौन संतुष्टि की ओर झुका हुआ, सैकड़ों और हजारों क्रियाओं और प्रतिक्रियाओं में शामिल हो जाता है। इस प्रकार, वह केवल इंद्रिय तृप्ति के उद्देश्य से भौतिक दुनिया में बना रहता है और एक शरीर से दूसरे शरीर में परिवर्तित होता रहता है। इतने सारे पुत्रों और पौत्रों को पुन: उत्पन्न करने की उसकी प्रक्रिया समाज, राष्ट्र, समुदाय आदि मार्फ़त परिणामित होती है। ये सभी समुदाय, समाज, राजवंश और राष्ट्र केवल यौन जीवन से विस्तारित होते हैं। जैसा कि प्रहलाद महाराज ने कहा है, यं मैथुनादि-गृहमेधी-सुखं हि तुच्छम् (भाग. 7.9.45)। गृहमेधी वह है जो इस भौतिक अस्तित्व के भीतर रहना चाहता है। इसका मतलब है कि वह इस शरीर या समाज के भीतर रहना चाहता है और दोस्ती, प्यार और समुदाय का आनंद लेता है। उसका एकमात्र आनंद यौन सुख भोगने वालों की संख्या में वृद्धि करना है। वह यौन सुख लेता है और बच्चे पैदा करता है, जो बदले में शादी करते हैं और पौत्र पैदा करते हैं। पौत्र भी शादी करते हैं और बदले में परपौत्र पैदा करते हैं। इस तरह, पूरी पृथ्वी अधिक जनसंख्या वाली हो जाती है, और फिर अचानक प्रकृति में युद्ध, अकाल, महामारी, भूकंप आदि के रूप में भौतिक प्रतिक्रियाएँ होती हैं। इस प्रकार, पूरी जनसंख्या फिर से नष्ट हो जाती है और फिर से बनाई जाती है। इस प्रक्रिया को भगवद् गीता (8.19) में बार-बार निर्माण और विनाश के रूप में समझाया गया है: भूतवा भूतवा प्रलीयते। कृष्ण चेतना की कमी के कारण, मानव सभ्यता के नाम पर यह सारा निर्माण और विनाश चल रहा है। यह चक्र मनुष्य द्वारा आत्मा और भगवान के परम व्यक्तित्व के ज्ञान की कमी के कारण जारी रहता है।
