श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 27: राजा पुरञ्जन की नगरी पर चण्डवेग का धावा और कालकन्या का चरित्र  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  4.27.8 
स पञ्चालपति: पुत्रान् पितृवंशविवर्धनान् ।
दारै: संयोजयामास दुहितृ: सद‍ृशैर्वरै: ॥ ८ ॥
 
 
अनुवाद
इसके बाद, अपने पितृकुल की वृद्धि के लिए, पांचाल देश के राजा पुरञ्जन ने अपने पुत्रों का विवाह योग्य वधुओं के साथ कर दिया और अपनी कन्याओं का विवाह योग्य वरों के साथ कर दिया।
 
Thereafter, King Puranjan of Panchala country, to expand his ancestral clan, married his sons to eligible brides and his daughters to eligible grooms.
तात्पर्य
वैदिक प्रणाली के अनुसार, सभी लोगों का विवाह करना चाहिए। एक व्यक्ति को पत्नी को स्वीकार करना होता है क्योंकि एक पत्नी बच्चे पैदा करेगी, और बच्चे बदले में भोजन सामग्री और अंतिम संस्कार समारोह प्रदान करेंगे ताकि पूर्वज, जहां भी निवास करते हों, प्रसन्न हो सकें। भगवान विष्णु के नाम पर प्रसाद चढ़ाने को पिंडोदक कहा जाता है, और यह आवश्यक है कि परिवार के वंशज पूर्वजों को पिंड प्रदान करें।

न केवल पंचाल के राजा पुरंजन अपने यौन जीवन में संतुष्ट थे, बल्कि उन्होंने अपने 1,100 पुत्रों और 110 पुत्रियों के यौन जीवन की भी व्यवस्था की। इस तरह से एक व्यक्ति एक कुलीन परिवार को एक वंश के मंच तक ऊपर उठा सकता है। इस श्लोक में यह महत्वपूर्ण है कि पुरंजन ने अपने पुत्र और पुत्रियों दोनों का विवाह कराया। अपने पुत्रों और पुत्रियों के विवाह की व्यवस्था करना पिता और माता का कर्तव्य है। वैदिक समाज में यही दायित्व है। जब तक पुत्रों और पुत्रियों का विवाह नहीं हो जाता, तब तक उन्हें विपरीत लिंग के साथ घुलने-मिलने की स्वतंत्रता नहीं दी जानी चाहिए। यह वैदिक सामाजिक संगठन बहुत अच्छा है कि यह अवैध यौन जीवन के प्रचार को रोकता है, या वर्ण-संकर, जो आज के इस समय में विभिन्न नामों से प्रकट होता है। दुर्भाग्यवश, इस युग में, हालाँकि पिता और माता अपने बच्चों का विवाह करने के लिए उत्सुक हैं, पर बच्चे माता-पिता की व्यवस्था से विवाह करने से इनकार करते हैं। इसके परिणामस्वरूप, विभिन्न नामों से दुनिया भर में वर्ण-संकर की संख्या बढ़ गई है।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)