न केवल पंचाल के राजा पुरंजन अपने यौन जीवन में संतुष्ट थे, बल्कि उन्होंने अपने 1,100 पुत्रों और 110 पुत्रियों के यौन जीवन की भी व्यवस्था की। इस तरह से एक व्यक्ति एक कुलीन परिवार को एक वंश के मंच तक ऊपर उठा सकता है। इस श्लोक में यह महत्वपूर्ण है कि पुरंजन ने अपने पुत्र और पुत्रियों दोनों का विवाह कराया। अपने पुत्रों और पुत्रियों के विवाह की व्यवस्था करना पिता और माता का कर्तव्य है। वैदिक समाज में यही दायित्व है। जब तक पुत्रों और पुत्रियों का विवाह नहीं हो जाता, तब तक उन्हें विपरीत लिंग के साथ घुलने-मिलने की स्वतंत्रता नहीं दी जानी चाहिए। यह वैदिक सामाजिक संगठन बहुत अच्छा है कि यह अवैध यौन जीवन के प्रचार को रोकता है, या वर्ण-संकर, जो आज के इस समय में विभिन्न नामों से प्रकट होता है। दुर्भाग्यवश, इस युग में, हालाँकि पिता और माता अपने बच्चों का विवाह करने के लिए उत्सुक हैं, पर बच्चे माता-पिता की व्यवस्था से विवाह करने से इनकार करते हैं। इसके परिणामस्वरूप, विभिन्न नामों से दुनिया भर में वर्ण-संकर की संख्या बढ़ गई है।
