श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 27: राजा पुरञ्जन की नगरी पर चण्डवेग का धावा और कालकन्या का चरित्र  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  4.27.7 
दुहितृर्दशोत्तरशतं पितृमातृयशस्करी: ।
शीलौदार्यगुणोपेता: पौरञ्जन्य: प्रजापते ॥ ७ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रजापति, राजा प्राचीनबर्हिषत्, इसी तरह राजा पुरञ्जन की भी ११० कन्याएँ उत्पन्न हुईं। ये सभी अपने माता-पिता की तरह ही यशस्वी थीं। उनका व्यवहार सौम्य था और वे उदार और अन्य अच्छे गुणों से युक्त थीं।
 
O Prajapati King Prajnabarhisat, in this way King Purañjana also had 110 daughters. All of them were as glorious as their father and mother; their conduct was noble, they were generous and were endowed with other excellent qualities.
तात्पर्य

शास्त्रों के नियमों और विनियमों के तहत जन्मे बच्चे आम तौर पर माता-पिता के समान अच्छे बन जाते हैं, लेकिन नाजायज तरीके से जन्मे बच्चे मुख्य रूप से वर्ण-संकर होते हैं। वर्ण-संकर आबादी परिवार, समुदाय और यहाँ तक कि खुद के लिए भी गैर जिम्मेदार होती है। पहले गर्भाधान-संस्कार नामक सुधारात्मक पद्धति के पालन से वर्ण-संकर आबादी पर रोक लगाई जाती थी, जो बच्चा पैदा करने का एक धार्मिक समारोह है। इस श्लोक में हम पाते हैं कि यद्यपि राजा पुरंजन ने बहुत सारे बच्चे पैदा किए थे, फिर भी वे वर्ण-संकर नहीं थे। वे सभी अच्छे, सुसंस्कृत बच्चे थे, और उनमें अपने पिता और माता जैसे अच्छे गुण थे।

यद्यपि हम कई अच्छे बच्चे पैदा कर सकते हैं, लेकिन निर्धारित विधि से परे की हमारी यौन इच्छा को पापपूर्ण माना जाना चाहिए। किसी भी इंद्रिय (केवल सेक्स ही नहीं) का बहुत अधिक आनंद लेने से पापपूर्ण गतिविधियाँ होती हैं। इसलिए व्यक्ति को जीवन के अंत में एक स्वामी या गोस्वामी बनना पड़ता है। पचास वर्ष की आयु तक बच्चे पैदा किए जा सकते हैं, लेकिन पचास के बाद बच्चे पैदा करना बंद कर देना चाहिए और वानप्रस्थ आश्रम स्वीकार कर लेना चाहिए। इस तरह उसे घर छोड़कर संन्यासी बन जाना चाहिए। एक संन्यासी की उपाधि स्वामी या गोस्वामी होती है, जिसका अर्थ है कि वह इंद्रिय भोग से पूरी तरह दूर रहता है। किसी को भी सन्यास आश्रम को मनमौजी तरीके से स्वीकार नहीं करना चाहिए वह पूरी तरह से विश्वस्त होना चाहिए कि वह इंद्रिय तृप्ति की अपनी इच्छाओं पर लगाम लगा सकता है। राजा पुरंजन का पारिवारिक जीवन निश्चित रूप से बहुत सुखी था। जैसा कि इन श्लोकों में उल्लेख किया गया है, उन्होंने १,१०० पुत्रों और ११० पुत्रियों को जन्म दिया। हर कोई चाहता है कि उसके बेटे बेटियों से ज्यादा हों, और चूँकि बेटियों की संख्या बेटों की संख्या से कम थी, इसलिए ऐसा प्रतीत होता है कि राजा पुरंजन का पारिवारिक जीवन बहुत आरामदायक और सुखद था।

 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)