श्रीमद् भागवतम  »  स्कन्ध 4: चतुर्थ आश्रम की उत्पत्ति  »  अध्याय 27: राजा पुरञ्जन की नगरी पर चण्डवेग का धावा और कालकन्या का चरित्र  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  4.27.7 
दुहितृर्दशोत्तरशतं पितृमातृयशस्करी: ।
शीलौदार्यगुणोपेता: पौरञ्जन्य: प्रजापते ॥ ७ ॥
 
 
अनुवाद
हे प्रजापति, राजा प्राचीनबर्हिषत्, इसी तरह राजा पुरञ्जन की भी ११० कन्याएँ उत्पन्न हुईं। ये सभी अपने माता-पिता की तरह ही यशस्वी थीं। उनका व्यवहार सौम्य था और वे उदार और अन्य अच्छे गुणों से युक्त थीं।
 
हे प्रजापति, राजा प्राचीनबर्हिषत्, इसी तरह राजा पुरञ्जन की भी ११० कन्याएँ उत्पन्न हुईं। ये सभी अपने माता-पिता की तरह ही यशस्वी थीं। उनका व्यवहार सौम्य था और वे उदार और अन्य अच्छे गुणों से युक्त थीं।
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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